बुधवार, 20 सितंबर 2017

क्या सोच के बनाई रे तूने ये दुनिया ?

क्या सोच के बनाई रे तूने ये दुनिया ?

अक्सर यह मौज़ू सार्वकालिक बने रहने वाला सवाल पूछा जाता है :ईश्वर ने ये सृष्टि बनाई ही क्यों ?

 छान्दोग्य  -उपनिषद का ऋषि प्रश्न करता से कहता है :अपने सृजन से पहले ,अपने अस्तित्व से पहले ये विश्व (गोचर जगत )केवल सनातन अस्तित्व ही था -सत् ही था। यह विश्व अपने निर्माण से पहले  केवल सत् (ब्रह्मण ,Brahman )ही था। वन विदाउट ए सेकिंड। ठीक एक सेकिंड पहले केवल ब्रह्मण ही था (ब्रह्मा जी नहीं ). कोई कच्चा माल मटीरियल काज नहीं था उसके पास कायनात के रचाव के लिए। घड़े के निर्माण के लिए जैसे मृत्तिका (मटीरियल काज )और घड़ा बनाने का चाक (Potters Wheel ),उपकरण या  इंस्ट्रयूमेन्ट  नहीं था। अलबत्ता वह ब्रह्मण स्वयं इंटेलिजेंट या एफिशिएंट काज ज़रूर था। 

ब्रह्मण के पास एक वासना (इच्छा ,डिज़ायर ज़रूर थी )-मैं एक से अनेक हो जावूं। 

"May I Become Many "-Taittiriya Upnishad ,2-6 

इसका मतलब यह हुआ जिसे हम सृष्टि का प्रसव कहते हैं वह एक ही ब्रह्मण की बहुविध प्रतीति है। 

Creation is just an appearance .

यही तो माया है भ्रान्ति है। नित -परिवर्तनशील सृष्टि यदि वास्तविक होती रीअल होती तो उसका कोई कारण ज़रूर होता। 

रस्सी में सांप दिखलाई देना एक प्रतीति है सांप है नहीं और न ही रस्सी  सर्प में तब्दील हुई है।सर्प का दिखलाई देना एक प्रोजेक्शन है मानसी सृष्टि है ,हमारे मन का वहम है। 

अब क्योंकि कायनात वास्तविक नहीं है वर्चुअल है ,इसलिए कारण इसका कोई असल कारण हो नहीं सकता जिसकी तलाश की जाए। 

आपने एक विज्ञापन देखा होगा एक व्यक्ति सालों बाद अपने शहर में आता है टेक्सी में बैठा अपने ही शहर का ज़ायज़ा लेता है -चिल्लाता है ठहरो !ठहरो भाई !यहाँ एक बैंक था। इसी तरह दूसरी जगह पहुँचने पर कहता है यहां एटीम था ,वहां एअरपोर्ट था वह कहाँ गया। जो अभी है अभी नहीं है वही प्रतीति है माया है। 

इसे (माया को )परमात्मा की एक शक्ति कहा गया है नौकरानी भी। परमात्मा का बाहरी आवरण (वस्त्र )ही माया है। हमारा वस्त्र हमारा यह शरीर है। ब्रह्मण कॉमन है दोनों में।ठीक वैसे ही जैसे सृष्टि निर्माण से पहले विज्ञानी एक ही आदिम अणु (प्राइमीवल एटम )की बात करते हैं जो एक साथ सब जगह मौजूद था। तब न अंतरिक्ष था न काल, था तो बस एक अतिउत्तप्त ,अति -घनत्वीय स्थिति बिना आकार का ,शून्य कलेवर अस्तित्व था। ऐसे ही उपनिषद का ऋषि एक सत् (ब्रह्मण )की बात करता है। 

आप पूछ सकते हैं वह वासना (डिज़ायर )आई कहाँ से क्यों आई कि मैं एक से अनेक हो जावूं ?

आप रात भर की नींद के बाद सुबह सोकर कैसे उठ जाते हैं ?

क्या अलार्म क्लॉक की वजह से यदि आप कहें हाँ तो कई और क्यों सोते रहजाते हैं अलार्म की अनदेखी होते देखी  होगी आपने भी । पशुपक्षी क्यों उठ जाते हैं ?उनके पास तो कोई घड़ी  नहीं होती। उपनिषद का ऋषि इस बात का ज़वाब देता है अभी आपकी एषणाएं ,अन फिनिश्ड अजेंडा बाकी है।सुबह उठते ही आप मंसूबे अपने उस आज का ,उस रोज़ का कैज़ुअल बनाने लगते है  

फुर्सत मिली तो जाना सब काम हैं अधूरे ,

क्या करें जहां में दो हाथ आदमी के। 

अच्छे कभी बुरे हैं हालात आदमी के ,

पीछे पड़े हुए हैं दिन रात आदमी के। 

हमारा पुनर्जन्म भी इस अधूरे अजेंडे को पूरा करने के लिए ही होता है। जिसको जो अच्छा लगे करे। भला या बुरा खुली  छूट है।बहरसूरत  काज एन्ड इफेक्ट से कोई मुक्त नहीं है। करतम सो भोक्तम। जब तक आप ये न जान लेंगें ,आप ही ब्रह्मण हैं सत् हैं ईश्वर हैं यह जन्म मरण का सिलसिला बदस्तूर जारी रहेगा। 

ये कायनात ,इस सृष्टि का बारहा  प्रसव होना विलय (Dissolution )होना हम सबकी सम्मिलित वासनाओं की ही अभिव्यक्ति है। 

बिग बैंग सिद्धांत भी यही कहता है: बिग बैंग्स कम एन्ड गो ,दिस प्रेजेंट बैंग इज़ वन  आफ ए सीरीज़ आफ मैनी मोर ,इन्फेक्ट इनफाइनाइट बिग बैंग्स। सबकुछ चांदतारा ,नीहारिकाएं ,बनते बिगड़ते रहते हैं आवधिक तौर पर। उनका होना एक प्रतीति है। 

नींद के दौरान जैसे मैं अव्यक्त हो जाता हूँ ,मुझे अपने स्थूल शरीर का कोई बोध नहीं रहता ,लेकिन मेरा अंतर -सूक्ष्म -शरीर ,अवचेतन बाकायदा काम करता है।वासनाएं अभी भी शेष हैं लेकिन वह कारण शरीर में विलीन हो जाती हैं इस दरमियान। 

इफेक्ट का अपने काज में विलीन हो जाना ही सृष्टि का विलय (Dissolution )कहलाता है। काज का इफेक्ट के रूप में प्रकट होना किरयेशन है ,सृष्टि का पैदा होना है। काज सत् है ब्रह्मण है। 

स्वर्ण और स्वर्ण आभूषण स्वर्ण ही है लेकिन स्वर्ण से आभूषणों का बनना सृष्टि है स्वर्ण का अम्लों के एक ख़ास मिश्र में विलीन हो जाना घुल जाना विलय है।आभूषण स्वर्ण ही हैं अलग अलग रूपाकार एक प्रतीति है।  

पुनरपि जन्मम ,पुनरपि मरणम ,

पुनरपि जननी ,जठरे शरणम। 

एक प्रतिक्रिया ब्लॉग इंडियन साइंस ब्लागर्स एशोशिएशन की उल्लेखित पोस्ट पर :
http://blog.scientificworld.in/2016/07/how-god-create-world-hindi.html

मंगलवार, 19 सितंबर 2017

कौन से घटक (कारक )बनते हैं अल्जाइमर्स रोग की वजह।

क्यों हो जाता है बुढ़ापे में स्मृति ह्रास रोग अल्ज़ाइमर्स ?कौन कौन से कारक इसकी वजह बनते हैं ?

समझा जाता है कोई एक वजह नहीं है इस रोग की  कालान्तर में हमारे दिमाग को न सिर्फ हमारी खानदानी (आनुवंशिक बुनावट ,जेनेटिक मेकअप )अपना असर ग्रस्त कर सकती  है हमारा माहौल भी पर्यावरणी घटक भी ,जीवन शैली भी।

पांच फीसद से भी कम मामलों में हमारी आनुवंशिक  रचना (जीवन इकाइयों )में होने वाले कुछ ख़ास परिवर्तन भी इसकी वजह बन सकते हैं। इस रोग की चपेट में आये मस्तिष्क में आपको कमतर कोशिकाएं (न्यूरॉन्स दिमाग की एकल कोशिका न्यूरोन कही जाती है  )मिलेंगी  ,जिनका पता शरीर छोड़ने के बाद ही दिमाग की आनुवंशिक जांच पड़ताल करने पर ही मिलेगा। अलबत्ता आपके जीते जी भी जीवित कोशिकाओं में भी कमतर सम्प्रेषण सेतु ,कनेक्शंस नेटवर्क  रह जाते हैं।

कालानतर में इन्हीं तमाम वजहों से दिमागी कोशिकाओं के छीजने टूटने से दिमाग भी सिकुड़ के छोटा रहजाता है पहले की बनिस्पत। दिमागी ऊतकों की बादे मार्ग ,यानी मरीज़ की मृत्यु के बाद माइक्रोस्कोपों से की गई सूक्ष्म जांच बतलाती है ,प्लाक्स और टेंगिल्स। यानी दो किस्म की एब्नॉर्मलिटीज़ (दिमागी कोशिकाओं में आये असामान्य बदलाव ) प्रकाश में आती हैं।

Plaques:प्लाक्स वास्तव में एक दिमागी प्रोटीन बीटा एम्लोईड्स के गुच्छ होते हैं जो बहुबिध दिमागी कोशिकाओं को नष्ट करते हैं। न्यूरॉन से न्यूरॉन के संवाद (न्यूरॉन -न्यूरॉन कम्युनिकेशन )को ये प्लाक्स बाधित करते हैं। कोशिका के बाहरी खोल को घेरे में ले लेते हैं ये प्रोटीन प्लाक। सम्भवतया यह घेरा बंदी ही न्यूरॉन्स की मौत की वजह बनती है।

Tangles:दिमागी कोशिकाएं एक आंतरिक वाहन प्रणाली ,इंटरनल सपोर्ट सिस्टम के आसरे रहती हैं । यही प्रणाली कोशिकाओं को पोषण मुहैया करवाती है तब तक जब तक के वह जीवित बनी रहती हैं।यह प्रणाली कारगर बनी रहे इसके लिए ज़रूरी होता है ,एक और प्रोटीन Tau (टो या टाउ )का संरचनात्मक और प्रकार्यात्मक तौर पर भी सामान्य बने रहना।

लेकिन दिमागी  कोशिकाओं के इस अपविकासी रोग में इस प्रोटीन के धागे परस्पर उलझ जाते हैं यही उलझाव टेंगिल्स की सृष्टि करता है। नतीज़न कोशिकाओं को पोषण की आपूर्ति रुक जाती है। पुष्टिकर तत्व मुहैया करवाने वाली वाहन  प्रणाली टूट जाती है। दिमागी कोशिकाओं के क्षय से भी ये टेंगिल्स बनते हैं प्रणाली ढहने लगती है।

कौन से घटक (कारक )बनते हैं अल्जाइमर्स रोग की वजह।(देखें सन्दर्भ सामिग्री ):

सन्दर्भ -सामिग्री: http://www.mayoclinic.org/diseases-conditions/alzheimers-disease/symptoms-causes/dxc-20167103






सोमवार, 18 सितंबर 2017

बुढ़ापे का रोग अल्ज़ाइमर्स कुछ मिथ और यथार्थ

बुढ़ापे का रोग अल्ज़ाइमर्स कुछ मिथ और यथार्थ

(१)महज मिथ है यह कहना मानना समझना ,बुढ़ापे का स्मृति ह्रास एक आनुवंशिक (खानदानी )बीमारी है जिसका सम्बन्ध हमारी आनुवंशिक रचना (जींस )से है। हमारे पर्यावरण के कुछ कारक (घटक )भी इसके लिए उत्तरदाई हो सकते हैं जिनकी शिनाख्त होने पर इलाज़ जल्दी शुरू हो सकता है।

(२) महज मिथ है यह मान लेना कि रोग का पता नहीं चलता है (रोग निदान मुमकिन नहीं है ).

यथार्थ यह है ९० फीसद तक इसका सही निदान (डायग्नोसिस )अब सम्भव है। रोगनिदान के नए नए उपाय आज उपलब्ध हैं इसलिए अब आरम्भिक चरण में ही रोग निदान कर लिया जाता है।

(३)तीसरा मिथ खामख्याली यह चली आई है कि दवाएं इसके इलाज़ में बे -असर रहतीं हैं।

यथार्थ यह है :दवाएं काम करतीं है नै नै दवाओं के कॉम्बो (कॉम्बिनेशन थिरेपी )रोग के बढ़ने की रफ़्तार को काम कर सकते हैं ,भले रोग पूर्व की अवस्था में न पहुंचा जा सके।

कुछ दवाएं जो आप लेते आएं हैं आपके रोग रोधी सुरक्षा कवच (इम्यून सिस्टम )के हाथ मजबूत करती रहती हैं।

(४ )मिथ यह भी चला आया है इसके होने इस रोग की चपेट में आने को मुल्तवी नहीं रखा जा सकता।

यथार्थ यह है आपकी खुराक ,कसरत ,तंदरुस्त जीवन शैली और बचावी चिकित्सा दवाएं इस रोग को मुल्तवी रखे रख सकतीं हैं।

मूलतया इसे पश्चिमी दुनिया खासकर अमरीका का रोग माना गया है भारत में इसे हम सठियाना कहकर टाल देते है।निरंतर कुछ न कुछ सीखते रहना  लिखते पढ़ते रहना दिमाग को कुंद होने से बचाये रहता है। रोग से भी बचाव का एक उपाय है स्वाध्याय।

अभी अभी आपने क्या किया था यह आप बुढ़ापे में भूलते रहते हैं यही शार्ट टर्म मेमोरी लास इस रोग का एक लक्षण हैं। सूंघने की शक्ति (घ्राण शक्ति )भी काम हो सकती है जो रोग का आरंभिक और प्राथमिक लक्षण माना जा सकता है।

आज काग्निटिव रिहेबिलिटेशन तकनीकें ,रणनीतियां उपलब्ध हैं जो कारगर बचावी उपाय सिद्ध हो सकतीं हैं। यूं उम्र के साथ सब कुछ छीजता है दिमाग का आकार भी। इस रोग में भी दिमाग सिकुड़ने लगता है कौन अजूबा है ये।

संदर्भ -सामिग्री :

https://mail.google.com/mail/u/0/#inbox/15e91aa6f71ce2d8

शनिवार, 16 सितंबर 2017

कन्या राशि में सूर्य का प्रवेश जिस अवधि में होता है उसे ही श्राद्ध पक्ष कहा समझा माना गया है

कनागत में बुलेट ट्रेन का उदघाटन करने पर मोदी पर छिद्रान्वेषण करने वाले मार्कवाद के बौद्धिक गुलाम तो धर्म को मानते ही नहीं इनके मुखिया तो इसे अफीम कह आएं हैं न ही इन भकुओं में से किसी को यह मालूम होगा कि कन्या राशि में सूर्य का प्रवेश जिस अवधि में होता है उसे ही श्राद्ध पक्ष कहा समझा माना गया है। हैलोवीन इसी का थोड़ा अलग सा संस्करण है। ये देश तोड़क जो हर बात में देश का विरोध करते हैं ,स्वयं साक्षात जीवित प्रेत हैं। एक श्राद्ध इनके लिए भी होते रहना चाहिए।

इस मुद्दे पर हमने भारत धर्मी समाज के चंद नाम चीन लोगों से बात की है मुद्दा रोहंग्या मुसलमानों से भी जुड़ा। इन मुसलमानों को जिन्हें   लश्करे तैयबा के  एजेंटों ने भारत में आतंक फैलाने की नीयत से घुसाने की कोशिश की है  इनकी हिमायत में भी कई  सेकुलर सड़कों पर आ  गए हैं। भारतधर्मी समाज के मुखिया प्रमुख विचारक डॉ नन्द लाल मेहता वागीश जी ने इस का एक हल यह सुझाया है -ये तमाम लोग जिनमें से कई कुनबों के पास बे -हिसाब जमीनें हैं अपनी जमीन इन रोहंग्या मुसलमानों के नाम कर देवें साथ ही भारत सरकार को ये लिखकर देवें -इन रोहंग्या कथित शरणार्थी लोगों का वोट नहीं बनाया जाएगा।

मसलन अखिलेश ,लालू ,सोनिया के पास ही बे -हिसाब संपत्ति है। ये पहल करें इस दिशा में यदि सचमुच मानवीय पहलू  इनकी नज़र में है (जिससे इनका कोई लेना देना रहता नहीं है ),इनका एक ही एजेंडा है मोदी बैटिंग ,मोदी हैटिंग एन्ड हिटिंग। इन देश भाजकों को यह नहीं पता -

फ़ानूस बन के जिसकी हिफाज़त हवा करे ,

वो शमा(शम्मा ) क्या बुझेगी  जिसे रोशन खुदा करे।

जिसे वाह -  गुरु की कृपा प्राप्त है ,कृष्णा का आशीष जिसके साथ है मोहम्मद साहब की दुआएं जिसे प्राप्त हैं उसका ये चंद फुकरे क्या बिगाड़ लेंगे जो आज कनागत की बात करते हैं ,असहिंष्णु जिसे घोषित कर चुके हैं उस भारत से सहिष्णुता की आज ये बात करते मानवीय पक्ष की बात करते हैं।

मैं सरयू तीरे इन भकुओं का  तरपन करता हूँ। 

वैदिक धर्म (हिदुत्व )के एक बड़े प्रतीक चिन्ह के रूप में एकाक्षरी (मनोसिलेबिल )समझे गए ॐ का क्या महत्व है?

वैदिक धर्म (हिदुत्व )के एक बड़े प्रतीक चिन्ह के रूप में एकाक्षरी (मनोसिलेबिल )समझे गए ॐ  का क्या महत्व है?

अमूमन किसी भी मांगलिक अनुष्ठान से पूर्व एक गंभीर और निष्ठ उदगार स्वत :प्रस्फुटित होता है हमारे मुख से एक अक्षरी ॐ। ये किसी भी अनुष्ठान के आरम्भ और संपन्न होने का सूचक होता है। चाहे फिर वह वेदपाठ हो या नित नियम  की वाणी (प्रार्थना ).गहन ध्यान -साधना ,मेडिटेशन का केंद्रबिंदु रहा है ॐ।

परमात्मा के नाम के करीब -करीब निकटतम बतलाया है ॐ को आदिगुरु शंकराचार्य ने। जब हम ॐ कहते हैं तो इसका मतलब परमात्मा से हेलो कहना है ,सम्बोधन है यह उस सर्वोच्च सत्ता की  प्रतिष्ठार्थ।

ॐ की बारहा पुनरावृत्ति (जप )वैराग्य की ओर ले जा सकती है इसलिए इसके जाप को  सन्यासियों के निमित्त समझा गया है। किसी भी प्रकार की वासना (इच्छा )सांसारिक सुख भोग की एषणा का नाश करता है इसका जप ऐसा समझा गया है। कहा यह भी गया यह गृहस्थियों को नित्य प्रति के आवश्यक सांसारिक कर्मों से भी विलग कर सकता है। सन्यासियों का ही आभूषण हो सकता है ॐ जो संसार से ,सब कर्मों से विरक्त हो ईश -भक्ति ,ज्ञानार्जन को ही समर्पित हो चुका है।

अलबत्ता इसका सम्बन्ध अन्य सभी मन्त्रों से रहा है ,ॐ अक्षर हर मन्त्र से पहले आता है ताकि गणपति (गणेश) मन्त्र जाप में कोई विघ्न न आने देवें। माण्डूक्य उपनिषद के अनुसार ॐ का निरंतर मनन अपने निज स्वरूप (ब्रह्मण ,रीअल सेल्फ )के सहज बोध की ओर ले जा सकता है। "ओंकार" का ज्ञान -बोध खुद को जान लेना है।

The name and the one that stands for the name are identical (are one and no second ).When we call a name there is an image of an object in our mind .

यह संसार नाम और रूप ही है। दोनों को विलगाया नहीं जा सकता। नाम का लोप होते ही संसार का लोप हो जाएगा। इसीलिए ओंकार की पुनरावृत्ति उसे साकार कर देती है जिसको यह सम्बोधित है।

ओंकार में तीन मात्राएँ "अ "; "उ " और  "म "शामिल हैं। ओ (O) दो मात्राओं का जोड़ है डिफ्थॉंग हैं अ और उ का। यानी अ -अकार और म -मकार।

"अ" को जागृत अवस्था का प्रपंच कहा गया है (प्रपंच या माया  इसलिए यह वे - किंग- स्टेट भी स्वप्न ही है फर्क इतना है इसकी अवधि औसतन ६० -७० वर्ष है बस जबकि नींद में आने वाले स्वप्न अल्पकालिक डेढ़ दो मिनिट से ज्यादा अवधि के नहीं होते .

उकार (उ )का सम्बन्ध उपनिषद ने स्वप्नावस्था से जोड़ा है। स्वप्न दृष्टा और स्वप्न देखने के अनुभव से जोड़ा है। जागृत अवस्था और स्वप्नावस्था परस्पर एक दूसरे का निषेध करते हैं। स्वप्नावस्था में आप को  न तो  स्थूल शरीर का बोध है न ज्ञानेन्द्रिय और कर्मेन्द्रीय का। स्वप्न देखने वाला मन ,स्वप्न के आब्जेक्ट्स सब स्वप्न की ही सृष्टि है जहां परबत ,समुन्दर से लेकर हर बड़े छोटे आकार की चीज़ें आप के यानी स्वप्न-दृष्टा के  द्वारा देखी जा रहीं  हैं ,स्वप्न के समय आपका अवचेतन मन सक्रीय है ,सूक्ष्म शरीर कार्यरत है स्थूल को कुछ पता नहीं है वह तो निढाल पड़ा है।

मकार (म )सुसुप्ति या गहन निद्रा (डीप स्लीप स्टेट )की स्थिति है जहां केवल आपका कारण शरीर(Causal Body ) शेष रह गया है ,वासनाएं हैं। सुबह उठकर आप कहते हैं -रात को मस्त नींद आई। ये कौन किस से कह रहा है वह कौन था जो गहन निंद्रा में था। फिर वह कौन है जो अब जागृत अवस्था में है ,जो स्वप्न देख रहा था वह कौन है। और मैं (मेरा स्व ,रीअल सेल्फ ) क्या है।

उपनिषद का ऋषि कहता है जो इन तीनों अवस्थाओं को रोशन कर रहा है वह 'तू '(यानी मेरा निज स्वरूप है रीअल आई है ).

अ ,उ ,म त्रय के और भी अर्थ निकाले गए हैं -तीन वेद(ऋग ,यजुर,साम )  -तीन लोक (मृत्य -स्वर्ग और इन दोनों के बीच का अंतरिक्ष ),तीन देवता (अग्नि- वायु- सूर्यदेव ),ब्रह्मा -विष्णु -महेश ,सतो -रजो -तमो गुण (त्रिगुणात्मक माया ). स्थूल -सूक्ष्म -कारण शरीर की तिकड़ी आदि। ज़ाहिर है तमाम सृष्टि का पसारा (विस्तार )इन तीन मात्राओं -अ,उ ,म में समाविष्ट है।

हम कह सकते हैं -Om refers to the personal form of  God ,the one with attributes i.e सगुण ब्रह्म।

मंगल ध्वनि ॐ  दो उच्चारणों के बीच का मौन -Impersonal form of God यानी निर्गुण ब्रह्म कहा जा सकता है। यह मौन निराकार है ,आयाम -हीन ,आयाम -शून्य ,Dimensionless है।

जबकि अ ,उ और म एक ड्यूरेशन (अवधि )लिए हैं ,मौन निर -अवधिक  है। इस प्रकार सिद्ध हुआ ओंकार ही प्रभु हैं प्रभु का नाम हैं।

महाकवि पीपा कहते हैं :

सगुण मीठो खांड़ सो ,निर्गुण कड़वो नीम ,

जाको गुरु जो परस दे ,ताहि प्रेम सो जीम।





शुक्रवार, 15 सितंबर 2017

माथे की बिंदी आबरू का शाल है हिंदी

हिंदी दिवस पर विशेष 

माथे की बिंदी आबरू का शाल है हिंदी ,

है देश मिरा  भारत ,टकसाल है हिंदी। 

है आरती का थाल मिरी  सम्पदा हिंदी ,

संपर्क की सांकल सभी है खोलती हिंदी। 

गुरुग्रंथ ,दशम ग्रन्थ भली रही हो कुरआन ,

एंजिल हो धम्मपद भले फिर चाहें पुराण ,

है शान में सबकी मिरी  लिखती रही जुबान ,

हैं सबके सब स्वजन मिरे ,सबकी मेरी हिंदी।

कर जोड़ के प्रणाम करे ,आपको हिंदी।  

है शान में सबकी मिरी , लिखती रही जुबान ,

शोभा में सबकी शान में, लिखती मिरी हिंदी। 

मैं तमाम हिंदी सेवकों को उनकी दिव्यता को प्रणाम करता हूँ। 

गुरुवार, 14 सितंबर 2017

गायत्री मंत्र एक विहंगावलोकन

गायत्री मंत्र एक विहंगावलोकन

उपनयनसंस्कार के वक्त (वेदों का  अध्ययन शुरू करवाते वक्त )गुरु अथवा पिता गुरुकुल परम्परा के मुताबिक़ यह मंत्र छात्र के कान में कहता उच्चारता था ताकि वह विधिवत वेदों का अध्ययन आरम्भ कर सके। तमाम वेद वांग्मय का सार कहा गया है गायत्री  मंत्र को।

ऋग्वेद में सात छंद (मीटर )आते हैं इन्हीं में से एक है गायत्रीछन्द। इस छंद के तीन पाद (चरण या पैर ,फुट )हैं। प्रत्येक पाद में आठ अक्षर आते हैं। इस प्रकार गायत्री  छंद २४ अक्षरीय है।

सूर्य  की स्तुति में इसका पाठ किया जाता है इसीलिए इसे सावित्री -मंत्र भी कहा गया है। सवितृ  माने सावित्री यानी भगवान्  सूर्यदेव का गुणगायन है स्तुति है प्रार्थना है सूर्य देव से- वह हमें  सही मार्ग पर चलाये हमारी मेधा को प्रज्ञा ,बुद्धिमत्ता प्रदान करे।

अन्यान्य मंत्र भी गायत्री छंद-बद्ध किये गए हैं। अमूमन हरेक  देवता की  स्तुति में इस छंद में रचनाएं हैं।इनमें गायत्री मंत्र सब से ज्यादा लोकप्रिय है।

मंत्र पाठ हम  सभी जानते हैं इस प्रकार है :

ॐ भूर्भुवस्सुवः ,तत् सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात

यहां ॐ परमात्मा को सम्बोधित है उसी का नाम है इसमें तीन अक्षर है अ ,उ ,म जो तीन उदगार (अभिव्यक्तियाँ )व्याहृतियाँ हैं। तीन Utterances हैंतीन  कथन हैं।

भूः भुवः सुवः   कथन हैं। उदगार हैं ये तीन जो ब्रह्माजी ने सृष्टि - रचना के क्षणों में अभिव्यक्त किये हैं उच्चारे हैं। इन्हें आध्यात्मिक ,रहस्यमय - ध्वनि -प्रतीक  भी समझा  गया  है।अनेकार्थ हैं इन ध्वनियों के जिनमें से एक है :

भूः मृत्यलोक ,भुवः पृथ्वी और सूर्य के बीच  के अंतरिक्ष तथा सुवः स्वर्ग के लिए आया है। इनसे व्युत्पन्न अर्थ भूः सत या सनातन अस्तित्व के लिए भुवः चित या ज्ञान के लिए और सुव: आनंद या ब्लिस के लिए आया है।यानी सच्चिदानंद। सत्यम ज्ञानम् अनंतं ।
अन्य अर्थों में सृष्टि की उत्पत्ति -पालना -और विलय (विनाश )लिए  हैं। जागृत ,स्वप्न एवं सुसुप्ति की तीनअवस्था का प्रपंच  स्थूल -सूक्ष्म -कारण तीन शरीर आदि भी अभिव्यक्त हुए हैं। गायत्री मन्त्र से पहले ये तीन उदगार ही अभिव्यक्त किए  जाते हैं।
ॐ वह परमात्मा भूः है ,भुवः है स्वः है। यानी वह एक ही सृष्टिकर्ता -पालनहार -और संहारकर्ता है सृष्टि का। वही सच्चिदानंद है वाहगुरु है अल्लाह है यहोवा है। वही सनातन अस्तित्व अनंत ज्ञान और कभी भी कम न होने वाला सदैव कायम आनंद है।गुरपरसादि  है।

वही तिरलोकी(त्रिलोक ) है जागृति स्वप्न एवं सुसुप्ति (डीप स्लीप स्टेट )का प्रपंच है। स्थूल -सूक्ष्म -कारण शरीर -त्रय है।

ये तीन उदगार ही गायत्री  के तीन पाद हैं पहला पाद है -तत्सवितुर्वरेण्यम दूसरा भर्गो देवस्य धीमहि और तीसरा यो न: प्रचोदयात।

ऐसा समझा जाता है की ॐ के  तीन अक्षर अकार (अ ),उकार (उ )और मकार (म ),तीन अभिव्यक्तियों ,भूः भुवः स्वः के उद्गम स्रोत हैं। इन तीन अक्षरों से ही गायत्रीछंद  के  तीन पाद बने हैं। प्रत्येक पाद से एक वेद निसृत है पहले से ऋग्वेद दूसरे से यजुर्वेद  तथा तीसरे से सामवेद  . इसीलिए गायत्री को वेदमाता भी कहा गया है वेद -जननी है गायत्री।     

प्रात : सूर्योदय से पहले और संध्या गौ -धूलि सूर्यके अस्ताचल गमन से पहले का वंदन है यह मन्त्र हम सभी के लिए।

मध्य दिवस काल (मिड - डे )में भी लोग सूर्य उपासना करते है। इसका बारम्बार उच्चारण संध्यावंदन का एक महत्वपूर्ण अंग है।

दो वाक्यों की निर्मिति भी माना जा सकता है इस मन्त्र को -पहला :हम ध्यान लगाते हैं प्रार्थी और प्रशंशक हैं उस सूर्य देव की स्वयं प्रकशित ख्यात भव्यता कांतिमान और बुद्धिमत्ता के  जो हमारे लिए सदैव ही वरेण्य है। मनभावन मनमोहक है।

सूर्यको प्रत्यक्ष देवता कहा गया है क्योंकि हम इसके प्रत्यक्ष दर्शन करते हैं इसका आलोक वस्तुओं से लौटकर हमारी आँख को देखने की क्षमता प्रदान करता है। वैदिक संस्कृति सूर्यदेव की सहज उपासक रही आई है। उल्लास और प्रकाश और ताप को बिखेरने वाला देव माना गया है सूर्य देव को पृथ्वी पर जीवन और किसीभी प्रकार की वनस्पति का स्रोत भी सूर्यदेव ही माने समझे गए हैं। अज्ञान को दूर करता है इसका आलोक अज्ञान के अँधेरे  से हमें ज्ञान की उजास की ओर लाता है यह स्वयं प्रकाशित   देव।

दूसरा  वाक्य सीधा सरल प्रत्यक्ष बोध में आता है :'यह ही प्रचोदयात ' यो नः प्रचोदयात -यह हमें सही मार्ग पर ले चले हृदय गुहा के अन्धकार अज्ञान को भगा हमें सत्य की और ले जाकर हमारे अपने ब्रह्म स्वरूप का बोध कराये। हमारी मेधा को प्रज्ञा में बदले।

हमारा मन बाहरी प्रभावों उद्दीपनों की चपेट में आता है और अंतकरण से भी  विचार सरणी आती हैं।हमारे मन बुद्धि सोचने की शक्ति चित्त को  बाहरी प्रभावों से निकाल सही मार्ग की ओर ले चलें सूर्यदेव।

इस सृष्टि ब्रह्माण्ड पूरी  कायनात के संदर्भ में सूर्य देव को सृष्टा पालन करता कायम रखने वाले देव का दर्ज़ा प्राप्त है -प्रकाश और सौर ऊर्जा के  अभाव सचमुच में जीवन चुक जाए।

पृथ्वी  पर सारी वनस्पति और सारा दृश्य प्रपंच सूर्यदेव का ही प्राकट्य है। व्यक्त अभिव्यक्ति है। निर्गुण ब्रह्म का सगुण  रूप है सूर्यदेव। 

ताप ऊर्जा और प्रकार-अंतर  से बरसात लाने वाला भी सूर्य देव ही है। जब किसी देवता के प्रसादन  के लिए हवन करते हैं हव्य सामिग्री अग्नि के हवाले की जाती है।यही सूक्ष्म रूप अंतरित हो सूर्य की  किरणों पर सवार  हो सूर्य में  संग्रहित हो जाती है। कर्मफल दाता के बतौर सूर्य देव हमारे सद्कर्मों के फलस्वरूप वर्षा जल प्रदान करता है। जल ही जीवन है जल चक्र को सूर्य ही चलाये रहता है। भगवद्गीता में कहा गया है यज्ञ ही बरसा लाते हैं।इसीलिए सूर्य को गॉड का दर्ज़ा प्राप्त है। सूर्य को ब्रह्म होने का दृष्टा  बन सब कुछ साक्षी भाव से देखने का दर्ज़ा भी प्राप्त है मेरे तमाम विचारों का नियामक है सूर्य देव मेरी हृद गुफा में उसी के ज्ञान का प्रकाश मेरे ब्रह्मण (Brahman ब्रह्मन ) स्वरूप को उजागर करे। वही ज्ञान स्वरूप बुद्धिमता का देव सूर्य मेरे विचारों की  बुद्धि का कम्पास बने यही भाव है गायत्री का।
व्यवस्था सृष्टि का स्वरूप है बाहरी विक्षोभ सतही ही है। इसी अव्यवस्था के अंदर लय -ताल समरसता व्याप्त है। यही लयताल मेरा निजस्वरूप भी है। इस प्रकार  मार्ग और लक्ष्य दोनों एक साथ है गायत्री मन्त्र। हम उस सूर्यदेव का ध्यान लगाते हैं जो हमारा लक्ष्य है जो हमारे मन बुद्धि विचार सरणी को सन्मार्ग पर ले जाए। सद्कर्म कराये हमसे। ताकि मैं अपनी निजता को  आँज  लक्ष्य के निकटतर आ सकूं।वह मुझसे भिन्न कहाँ हैं मैं इस द्वैत को पहचान सकूं , मान सकूं यही अद्वैत वेदांत है। मेरे निज स्वरूप और ब्राह्मण में अद्वैत है द्वैत एक प्रतीति मात्र है मैं इसे समझ सकूं यही इस मन्त्र के निहितार्थ हैं।

ॐ शान्ति।

सगुण मीठो खांड़  सो,निर्गुण कड़वो नीम  ,

जा को गुरु जो परस दे ,ताहि प्रेम सो जीम।

जयश्रीकृष्ण।

विशेष ;प्रपंच शब्द मेरी इस अभिव्यक्ति में कई मर्तबा आया है। स्पस्ट कर दूँ माया के लिए प्रयुक्त किया जाता है यह शब्द।जो अनुपस्थित हो लेकिन अपने होने का बोध कराये वह माया है। जो सत्य प्रतीत हो , असत्य भी और दोनों  ही  नहीं हो वह माया है। जैसे स्वप्न एक प्रतीति है अल्पकाल की ,एक प्रपंच है जो जागने पर गायब हो जाता है वैसे ही जागृति भी एक प्रपंच है दीर्घकाल का (सत्तर अस्सी साल होती है आदमी की उम्र उसके बाद यह काया कहाँ चली जाती है यही तो माया है ,जो ट्रान्जेक्शनल रियलिटी ज़रूर है सत्य नहीं है लेकिन असत्य भी नहीं है क्योंकि मेरा  उसके साथ लेन  देन  है ट्रांसजेक्शन है।  उसी तरह सुसुप्ति (डीप स्लीप स्टेट )एक प्रपंच है कई मर्तबा बड़ी मस्त नींद आती है सुबह उठके हम कहते हैं रात बहुत अच्छी नींद आई। कौन किस्से यह कह रहा है कहने वाला कौन है ?सोया कौन था ?उठा कौन है ?यही प्रपंच है। सत्य वह है जो इन तीनों अवस्थाओं जागृति -स्वप्न -सुसुप्ति को आलोकित करता है साक्षी बनता है इन तीनों स्टेटस का ,वही मेरा असल स्वरूप है रीअल सेल्फ है ब्रह्मण है।मैं वही हूँ।