मंगलवार, 21 नवंबर 2017

Vijay Kaushal Ji Maharaj | Shree Ram Katha Ujjain Day 12 Part 2 ,3

तुम हो प्राण पति 

भक्ति का यही मतलब होता है -जो भगवान से विवाहित हो जाता है वह भगवान् की सारी संपत्ति का मालिक हो जाता है। 

भगवान् से विवाहित होने के लिए तीन काम करने होंगे -जानकी जी ने ये तीनों काम किये :

(१ ) बाग़  में आना -ये बाग  में आना क्या है -सत्संग में आना है बाग  में आना 

संत सभा चहुँ दिस , अमराई -

भवन को कहाँ ढूंढें -सत्संग में जाना पड़ेगा 

मीरा जी ने कहा चले जाओ सतसंग में -

राम जी से मिलने का सतसंग ही बहाना है ,
दुनिया वाले क्या जाने हमारा रिश्ता पुराना है। 

तीर्थों में ढूंढा तुम्हें ,मंदिर में न पाया है  ,
कथा के मंडप में मेरे राम का ठिकाना है।

(१ )जानकी जी संतों के  सानिद्य में गईं। 

(२ )जानकी जी ने सरोवर में स्नान  किया -सरोवर क्या है संत के हृदय में स्थान पाना ,हृदय में प्रवेश पाना सरोवर में स्नान करना है। 

(३ )गौरी (श्रद्धा )की पूजा की 

शुभ की प्यास जितनी बढ़ती जायेगी -समाज सेवा ,गुरु की सेवा और कैसे करूँ ,दान  ,पुण्य मैं और कैसे करूँ ,ये जो शुभ की और -और की जो प्यास है यह जितनी बढ़ेगी  परमात्मा का प्रकाश उतना ही आपकी ओर बढ़ता चला आएगा।पुण्य का शेयर बढ़हाइये। 

जीवन में श्रद्धा चाहिए।   

श्रद्धा बिना धर्म नहीं होइ ....

जानकी जी गुरु पूजन के लिए अष्ट सखियों के साथ मंदिर चलीं गईं। ये जो अष्ट सखियाँ हैं ये और कुछ नहीं - अष्टांग सेवा है योग में जो अष्टांग योग है वही यह अष्ट सेवा है। एक सखी दौड़ती हुई  आई -चलो पूजन बाद में कर लेना पहले भगवान् को तो देख लो -वो दोनों राजकुमार बाग़ में आये हैं ,जो विश्वामित्र जी के साथ आये थे। 

देखन बाग़ कुंवर दोई  आये ...

वय किशोर सब भाँती सुहाई ,

श्याम गौर किमी कहहुँ बखानी। 

गिरा अनयन ,नयन बिनु वाणी  .... 

जाने बिनु न होय परतीति ...

बिनु परतीति होय नहीं प्रीति  

प्रीति  बिना नहीं भगति विहाई 

जिमि खग पति .... 

जिनके मन में लालसा है बस कथा सुनिए -कथा वाचक बस कथा वाचक  होता है, बड़ा है या छोटा है ये मत देखो वक्तव्य देखो उसका । कथा से दर्शन होता है। 

विभीषण से भगवान् ने पूछा-" हमारे पास तक कैसे आ गए" -

बोले विभीषण लंका मेंआपकी कथा सुनी थी , 

"किससे सुनी "पूछा भगवान् ने 

श्री हनुमान से ,कथा सुनते- सुनते ही मेरे मन में यह लालसा पैदा हो गई जिसकी कथा इतनी सुन्दर है वह कितना सुन्दर होगा।उसे चलकर देखा जाए। 



सखी ने कथा सुनाई ,कथा सुनकर जानकी जी में भगवान् के दर्शन की लालसा पैदा हो गई ,पूजा छोड़कर चल दीं ,पूजा तो दर्शन के लिए की जाती है और वह भगवान्  तो द्वार पर ही खड़ा है जिसके लिए पूजा करने बाग़ में जा रहीं थीं । जानकी जी दर्शन को चली हैं चलने से उनके आभूषण बजने लगे। 

खनखन खनखन आभूषण बजने लगे -

कंकण किंकिन नूपुर  धुन......  

भगवान् पुष्प चुन रहे थे -टकटकी लगाकर भगवान् देखते हैं कौन आ रहा है ?भगवान् लक्ष्मण से बोले - लक्ष्मण मेरे मन में बड़ा आकर्षण पैदा हो रहा है ,लगता है  कोई कामदेव आज आक्रमण करने  आ रहा  है। 

लक्ष्मण जी तो भगवान् की सेज हैं अनंत शेष हैं ,शेष नाग हैं सहस्र फणीश्वर, जिस  शैया  पर भगवान् लेटे  रहते हैं वही तो लक्ष्मण हैं ,शैया पर ही तो व्यक्ति अपने मन की बात  कर सकता है।  लक्ष्मण  जी परम -वैराग्य -वान महापुरुष  हैं जैसा इतिहास में दूसरा खोजे नहीं मिलेगा जिन्होनें सिर्फ जानकी जी के सदैव चरण और बिछिया ही देखे हैं ,उन्हें माता कह कर पुकारा है कभी भाभी नहीं कहा है।सुग्रीव जब मार्ग से बीने जानकी  जी के आभूषण दिखाता है (जानकी जी के रावण द्वारा अपहरण के बाद जो मार्ग में उसे गिरे मिले थे ),तब लक्ष्मण कहते हैं मैं इन आभूषणों को नहीं पहचानता क्योंकि मैंने तो माँ के सिर्फ  चरण ही सदैव देखे हैं सिर्फ बिछिया (बिछुवे )पहचान सकता हूँ ,ये शेष आभूषण नहीं। 

फिर भगवान् का यह आकर्षण भक्ति के प्रति है इसलिए भगवान् लक्ष्मण जी से अपने मन की बात कर सकते हैं कह सकते हैं। इसमें कुछ लोगों को अटपटा लग सकता है के भगवान् छोटे भाई के साथ श्रृंगार की बात सांझा कर रहे हैं लेकिन इसमें अटपटा कुछ है नहीं। सारी  श्रृंगार की वार्ता तो बिस्तर पर बैठ कर ही होती है। लक्ष्मण तो भगवान् की सेज़ हैं शैया हैं  अनंत  शेष रूपा। वो तो सारी चर्चा पत्थर की तरह तटस्थ भाव लिए सुन रहे  हैं। लक्ष्मण इस चर्चा का स्वाद नहीं ले रहे हैं सिर्फ भगवान् ले रहे हैं। आम आदमी सोच सकता है अगर भगवान पार्क में बाग़ में ये बात कर सकते हैं तो हम क्यों नहीं कर सकते इसलिए भगवान् ने स्पष्ट कर दिया -

जासु बिलोकि अलौकिक शोभा ,
सहज विराग रूप मन मोरा। 
रघुवंसिन करि सहज सुभाउ ,
मन कुपंथ  पग धरहु न काहू ...... 
जेहि सपनेहु  परनारी न हेरी


लक्ष्मण  मैंने  कभी सपने में भी परनारी को नहीं देखा ,पता नहीं विधाता आज क्या चाहता है।यह कैसा सम्मोहन आकर्षण है ?  



पूजन गौरी  सखी ले आईं। 

करत प्रकाश बिरहि  पुरवाई 

तात जनक सन आवै सोइ.

लक्ष्मण मेरा शरीर तो यहां हैं लेकिन मेरा मन वहां हैं  जहां से आभूषणों की खनक रुनझुन की आवाज़ आ रही है। भक्ति के प्रति भगवान् का अनुराग नहीं होगा तो किसके प्रति होगा। जानकी जी भक्ति की प्रतीक हैं। लक्ष्मी जी की भी प्रतीक हैं। 

जानकी जी ने जब प्रभु का प्रथम दर्शन किया ,अपने नेत्र मूँद लिए ताकि भगवान निकल कर  चले न जायें । जानकी जी नेत्रों के कपाट मूँद लेती हैं।भक्ति भगवान् को पाकर उन्हें खोना नहीं चाहती। हम भगवान् का दर्शन इसलिए नहीं कर पाते ,भगवान् बेशक बड़े दयालु ,बड़े कृपालु भी हैं लेकिन ईर्ष्यालु भी बहुत हैं जब वह हृदय में हों तो कोई बाहर का दृश्य प्रवेश न करे ,इसीलिए भगवान् खुली आँख से निकलकर चले जाते हैं। 

जानकी जी ने जब देखा अरे ये तो इतने कोमल हैं इन्हें फूल की कली तोड़ते हुए भी पसीना आ रहा है। इतना भारी -भरकम शिव धनुष  कैसे तोड़ेंगे जिसे बड़े बड़े महाबली हिला भी न सकें ?ममता वश माँ को भी अपना बेटा सदा कमज़ोर ही नज़र आता है ऐसा ममता वश ही होता है। आशंका अतिशय प्रेम से प्रेरित होती है। आशंका का कोई आधार नहीं होता है अफवाह की तरह ,लेकिन ऊपर उठती जाती है अफवाह की तरह बिना पंख के पाखी सी। 

"धनुष कठोरता का प्रतीक था और अहंकारी को तोड़ने में मुझे ज़रा भी श्रम नहीं करना पड़ता लेकिन ये तो भक्ति की कलियाँ हैं इन्हें तोड़ने में मुझे  श्रम करना ही पड़ता है कोमल भावनाओं को कैसे तोड़ू मेरा हृदय काँप जाता है-राम तुलसीदास जी से कहते हैं  "

  -यही सवाल जो जानकी जी मन में सोच रहीं हैं  एक बार तुलसीदास जी ने भगवान् से पूछा था भगवान् यह कैसी लीला है आपकी इतना भारी भरकम धनुष आप फूल की तरह उठा लेते हैं और फूलों की कलियाँ तोड़ते हुए आपके माथे पे पसीना छलक आता है। 

विनय प्रेम वश भइँ भवानी -

 हंसी माल मूरत मुस्कानी  . 

विनय की प्रतीक हैं जानकी  जी। गौरी के सामने पछाड़ खाकर गिर जातीं हैं। भवानी (गौरी )कहती हैं बेटी तुम्हारी विनय को  मैंने स्वीकार किया है तुम्हें  यही वर मिलेगा। 

सुफल मनोरथ होये तुम्हारी ,

रामलखन सुनी भये सुखारी। 

भगवान् ने  लक्ष्मण जी से पूछा ,तुम्हें आशीर्वाद कैसे दे दिया ,जानकी जी तो मुझे मिलेंगी ,बोले लक्ष्मण जी भैया तुम तो जानकी जी में डूबे थे जानकी जी की उन आठ सखियों में उर्मिला भी थीं मैंने उन्हें और उन्होंने मुझे भी देख लिया था इसीलिए भवानी का आशीर्वाद मुझे भी मिला है। 

आज का सूर्योदय जानकी जी का भाग्य लेकर आरम्भ हो रहा है।

जिनके रही भावना जैसी ,

प्रभु मूरत तिन देखिन जैसी  . 

जिसकी जैसी भावना थी  भगवान्  उनको उसी रूप में दिखाई दे रहे हैं । दुष्टों को महाकाल ,भक्तों को महावीर लग रहे थे।वत्सल माँ को बड़े कोमल ...  

सुभग श्रृंगार ...किशोरी जी धीरे -धीरे मंडप में प्रवेश कर रहीं हैं सारा मंडप भक्ति की सुगंध से भर जाता है। 

धीरे चलो सुकुमार सुकुमार सिया प्यारी .....  

जगत जननी अकुलित छवि भारी ..... 

धीरे चलो सुकुमार सुकुमार पीया प्यारी .... 

..... 

 देश विदेश के राजा आये ,कर करके नाना श्रृंगार 

श्रृंगार सिया प्यारी ,धीरे चलो सुकुमार ,सुकुमार सिया प्यारी। 

भक्ति की गति धीरे धीरे चलो ,धीरे -धीरे ही भक्ति आगे बढ़ती है। भजन भी  धीरे -धीरे बढ़ता है ,भक्ति बहुत सुकुमारी होती है भक्ति लता की प्रतीक है ,वृक्ष ज्ञान के प्रतीक होते हैं। लता को  उठने के लिए गुरु का सहारा चाहिए। बिना गुरु सहारे के लता वेळ वल्लरी ऊपर चढ़ ही नहीं सकती बहुत सुकुमार होती है वेळ ज्यादा पानी लगा दिया तो लता गल जाती है कम मिलने पर सूख जाती है ।वासना के कांटे न आ जाएँ, सालों साल का भजन एक पल में नष्ट हो जाता है इसलिए बहुत संभाल के चलो।वासना ,काम की बाड़ चारों ओर से भक्ति को घेर लेती है।  

मेरी नाव चल रही गुरु के सहारे .....  

हम सब गुरु जी के ,गुरु जी हमारे। 

भक्ति में अंत समय तक गुरु का सहारा चाहिए लक्ष्य तक पहुँचते -पहुँचते नित्य सहारा चाहिए ,कभी भी विकार की आंधी आकर भजन को चौपट कर सकती है। इसलिए गुरु की आखिर तक लक्ष्य तक पहुँचने तक जरूरत रहती है। 

स्वयंवर की घोषणा के नियम नगाड़े के साथ पढ़े जाते हैं :

हे महाबलियों ,देश -विदेश के राजाओं ये जो धनुष आप शंकर जी का देख रहे हैं यह राहु के समान कठोर है और आप की भुजाओं की ताकत चन्द्रमा के समान है ,  अति - बलशाली है ,जो भी इस धनुष को तोड़ देगा जानकी जी निसंकोच उसके गले में वरमाला डाल देंगी ,इस बात पर विचार नहीं किया जाएगा के ये छोटी रियासत का मालिक है या बड़ी का। किस जाति और वर्ण का है करो प्रयास। 

यहां बड़ा भारी व्यंग्य है ,चन्द्रमा का अपना प्रकाश नहीं होता और फिर यह जनकपुरधरम शील नगरी है यहां अधर्म नहीं होता। यहां सब करम शील ग्यानी गुणवान ही रहते हैं सब श्रेष्ठ पुरुष निवास रहते हैं। 

अयोध्या भी संत महात्माओं की नगरी है लेकिन वहां भी एक दुष्ट है मंथरा और लंका में सब दुष्ट निवास करते हैं लेकिन वहां एक सद्पुरुष विभीषण भी  है। 

यहां तो जगत माँ बैठी है।सूर्य वंश का परम प्रकाश बैठा है और चन्द्रमा का प्रकाश तो उधार लिया होता है और तुम्हारी भुजाओं में चंद्र की ही ताकत है।  

तुम यहां बैठे हो तुम्हें शर्म नहीं आती क्योंकि चन्द्रमा सागर का बेटा है और लक्ष्मी जी सागर की बेटी हैं ,जानकी जी भी लक्ष्मीजी  की ही प्रतीक हैं।

यहां जनकपुर में तो  तो नौकर भी गुणवान है जिसने ये वक्रोक्ति पढ़के सुनाई है वह ढिंढोरची भी गुणी है ,जिसने घोषणा सुनाई है । इसका अर्थ हुआ चन्द्रमा जी और लक्ष्मी जी बहिन भाई हैं  ,तुम बहन से विवाह करने आये हो।तुमको शर्म नहीं आई। जानकी जी के हाथ में तो तुम्हारी राखी होनी चाहिए थी तुम उनके संग पाणिग्रहण करने आये हो। 

लेकिन मूढ़ता के कारण इन मंद -मति राजाओं  को ये गूढ़ भाषा समझ ही नहीं आई। 

कुछ भोले भाले राजा भी आये थे जिन्हें पता था सूर्यवंशी राम ही धनुष तोड़ेंगे ,ये सब भगवान् की लीला देखने आये थे। 

कुछ राजा बोले हम को यहां आकर पता चला जानकी जी धरतीकी बेटी हैं और हम धरती के मालिक भूपति  हैं , तो जानकी जी हमारी बेटी हुईं अब हम कन्या दान देकर  कन्या दान के बाद ही  जाएंगे। 

लेकिन कुछ मूर्ख राजा अपनी ज़िद पर अड़े हुए हैं। अपने -अपने इष्टों को प्रणाम करते हैं  -हे  ईष्ट देव ये धनुष मुझसे तुड़वा देना ,मुझसे न टूटे तो कोई और भी न तोड़ सके। समाज की आज यही स्थिति है,मैं कोई अच्छा काम न कर सकूं तो दूसरा भी क्यों करे मैं कमसे कम ऐसी व्यवस्था तो करूँ। 

दस हज़ार राजा उठे धनुष उठाने के लिए (वास्तव में वे धनुष को दबोच  रहे थे नीचे की ओर ताकि कोई और भी धनुष न उठा सके  ). आखिर में सब राजा शांत होकर बैठ गए हताश होकर। 

भक्ति की  ओर सकाम भाव से मन में कोई आशा लेकर देखोगे तो  भक्ति तुम्हारी और देखेगी भी नहीं। आशा एक राम जी से रखो ,दूसरा न कोई जिससे आस रखो। 

जनक जी मंच पर आये -घोषणा की अगर मुझे पता होता परशुराम ने धरती को वीरों से शून्य कर दिया है तो मैं ऐसी कठोर शर्त न रखता। राजा लोग अभी भी बैठे हैं। जनक जी फिर मंच पर आ गए। जनक जी फिर बोले आशा त्यागो अपने अपने घर जाओ अब क्यों बैठे हो। राजा हल्ला करने लगे क्यों चले जाए क्या हो गया। जनक जी बोले -

तजहुँ आस निज निज घर जावु , 
लिखा न विधि  वैदेही विवाहु ...   

बोलते बोलते जनक जी रो पड़े ...ये एक ग्यानी नहीं एक बाप रोया था के मेरी बेटी अब कुवारी ही रह जायगी क्या ? 

रोते -रोते भी वेदांत बोला -अपने अपने घर जाओ जाकर सोचो आप भक्ति के योग्य भी हो  या नहीं । आशा लेकर भजन करोगे तो भक्ति तुम्हारी ओर देखेगी   भी नहीं। भक्ति फलीभूत नहीं होगी।भजन आगे नहीं बढ़ेगा।  

वीर विहीन महि मैं  जानी ...

जैसे ही लक्ष्मण जी ने जनक जी के मुख से ये सुना लक्ष्मण जी आवेश में खड़े हो गए -बोले भगवान् क्षमा कर देना -जहां आप बैठे हों वहां कोई ये कहे ये धरती वीरों से विहीन हो गई ये मैं सह नहीं सकता -आज तक मैं आपके सामने कभी बोला नहीं  हूँ  ,आज बोल रहा हूँ और जनक जी को इंगित करके बोले यदि धनुष तोड़ना ही वीरता है तो मैं इसे पल भर में ही वैसे तोड़ दूँ जैसे हाथी अपनी सूंड से कमल नाल को तोड़ देता है ,मैं चाहूँ तो सारे ब्रह्माण्ड को उठाकर एक हज़ार  योजन दौड़ जाऊँ ,कच्चे घड़े के समान फोड़ दूँ  और यदि ऐसा न कर सकूं तो सुमित्रा का  पुत्र न कहाऊँ।

क्योंकि आप ने यह सब कहा है इसलिए मैं चुप हूँ कोई और होता तोअब तक गर्दन धड़  सेअलग कर देता। धरती कांपने लगी। लक्ष्मण  जी भगवान् की तरफ देखतें हैं ,वे मंद -मंद मुस्कुरा रहें हैं मानो कह रहे हों बहुत अच्छा किया तुमने ,सही निभाया अपना रोल मौके पर सही बात कहकर -

सूर्य प्रकट होने से पहले लालिमा प्रकट होती है ,लालिमा प्रकट तूने कर दी प्रकाश मैं  कर दूंगा। महाकाल की गर्जना तूने कर दी ,कृपा मैं कर दूंगा। 

राम  बिना गुरु आज्ञा के कुछ नहीं करते बुरा उन्हें भी  लगा है।लेकिन भगवान को भी गुरु की आज्ञा लेनी ही पड़ती है कुछ करने से पूर्व ,इसीलिए भगवान् अभी तक खामोश बैठे थे।  

अब विश्वामित्र को अपनी गलती महसूस हुई -बोले राघव उठो  धनुष भंजन कर जनक का ताप हरो। जानकी जी मन ही मन अकुला रहीं हैं और एक बार आँखों से संकेत कर दिया भगवान धरती की बेटी धरती में ही समा जाएगी अगर धनुष न उठाया तो ,भगवान् ने जानकी जी की आँखों में आंसू देखे ,भगवान् "भक्ति "की आँखों में आंसू नहीं देख सकते। भक्ति के आंसू में भगवान् को पिघलाने की ताकत है। भगवान् आकुल हो गए -भगवान् ने धनुष की तीन परिक्रमाएं की ,जानकी जी और सुनैना को मन ही मन प्रणाम किया ,शिव पार्वती को प्रणाम किया ,गणेश जी को प्रणाम किया ,गुरुवार को प्रणाम किया और उन्होंने धनुष को फूल की तरह उठाकर प्रत्यंचा खींच दी। 

इससे ठीक पहले लक्ष्मण जी खड़े हो गये थे ,क्योंकि धनुष के टूटने से भारी टंकार होगी वह जानते थे धरती काँप  जाएगी ,इसीलिए उन्होंने सारे प्रजापतियों और दिक्पालों को सावधान कर दिया ,धरती को संभाल जबड़ों से संभाल कर रखें ,धरती  काँपती  तो रघुवर के विवाह में विलम्ब पैदा  होता ,ऐसा कुछ न हो  जाए इसीलिए लक्ष्मण जी इससे पहले के भगवान् धनुष तोड़ें खड़े हो गए थे। 

प्रभु  दोउ  चाप खंड महि डारे ,

देखि लोग सब भये सुखारे। 

सखियाँ वरमाला के साथ जानकी जी  को भगवान् के सामने खड़ा करती हैं ,जानकी जी वरमाला डाल नहीं पा रहीं हैं। जानकी जी जानकर  के देर कर रहीं हैं  सोचते हुए जब आपने धनुष तोड़ने में इतनी देर की तो मैं जोड़ने में भी तो देर करूंगी। 

झुक जइयो लखन के तात  ,

किशोरी मेरी छोटी सी। 

लोग लुगाई गा रहे हैं....  

भगवान् लम्बे हैं किशोरी जी छोटी सी हैं ,भगवान् के गले तक उनके हाथ नहीं पहुँचते ,लक्ष्मण जी की ओर  देख कर संकेत करती हैं ,धरती को थोड़ा ऊपर उठा दो ताकि मेरे हाथ भगवान के गले तक पहुँच जाए ,लखन बोले भगवान् भी तो उतने ही ऊपर उठ जाएंगे वे भी तो उसी धरती पर खड़ें  हैं।

अंत में लक्ष्मण जी को एक युक्ति सूझी लखन भगवान के आगे दंडवत प्रणाम करने के लिए लेट गए ,भगवान जैसे ही उन्हें उठाने के लिए झुके जानकी जी ने वरमाला भगवान् के गले में डाल दी।  

देवर का मतलब ही यह होता है -दे वर ! 








   



  




   












Vijay Kaushal Ji Maharaj | Shree Ram Katha Ujjain Day 12 Part 1 ,2

बड़े भाग पाइब सत्संगा ,


बिनहिं  प्रयास होइ भव भंगा।


अति हरि कृपा जाइ  पे होइ ,


पावत है एहि मारग  सोहइ  . 


आज संतों की चर्चा के तहत कथा से पहले(जाट जाति में जन्में ,राजस्थान के टोंक शहर के निवासी ) संत धन्ना जी की चर्चा :

संत धन्ना एक दिन अपने खेत पर गए देखा -वहां संत बैठे हैं धन्ना जी ख़ुशी से नाचने लगे संत अचानक क्या मेरे ऊपर तो प्रभु की ही कृपा हुई है सोचते हुए ।

 संत जब संतृप्त होकर खाने के बाद डकार लेते हैं ,सारे आशीर्वाद ऊपर आ जाते हैं। आज गेहूं के खेत के रूप में भगवान् मिले हैं। बीज तो मैंने सारा बाज़ार में बेच दिया था ,संतों के लिए भोजन सामग्री जुटाने के बदले। सिर्फ मैंने तो  बीज बोने का नाटक किया था। ताकि पिता  पीटें न। ये फसल कैसे लहलहाई। ?

मजदूर इतना सुंदर कैसे हो सकता है स्वयं भगवान् आज धन्ना के खेत में कामगार मजूर बनके  आएं हैं काम मांगने। धन्ना को रोमांच हो आया है। मजदूर इतना सुंदर कैसे हो सकता है। धन्ना के पूर्व जन्म के संस्कार उभर आये।धन्ना सोचे जा रहा है मजदूर इतना सुंदर कैसे हो सकता है।  

धन्ना जी को इहलाम होने लगा है -ये  कोई साधारण मजूर नहीं हो सकता।अवचेतन की स्मृतियों में भगवान् बसे  थे।मजूर के रूप में ही भगवान् कहने लगे मैं खेत की हिफाज़त कर लूंगा मुझे अपने खेत पे रख लो।मुझे काम चाहिए ,मेरे पास इस समय कोई काम नहीं है।  

तय हो गया एक चौथाई उत्पाद (हिस्सा  )मजूरी के रूप में मजदूर को देने को धन्ना राजी हो गए। 

जिमि बालक राखहिं महतारी .....

भगवान् बोले हम को और कुछ आता ही नहीं है ,हम खेत में ही रहेंगे ,रोटी तुम्हें यहीं पहुंचानी पड़ेगी। साझियाँ  के रूप में भगवान् सोये पड़े हैं। भूखे प्यासे। धन्ना ने सांझियाँ के चेहरे से खेस उठाया देखा ये तो साक्षात भगवान् राघवेंद्र सरकार हैं।भगवान् हड़बड़ा कर उठे और पुन : सांझिया का भेष बना लिया। 

धन्ना जी गाने लगे -

श्री रामचंद्र कृपाल भजमन हरण भव भय दारुणं .... 

भगवान् बोले गाना -वाना बाद में गाना बहुत ज़ोर की भूख लगी है अपनी पोटली खोलो क्या लाये हो खाने का। धन्ना जी माफ़ी मांगने लगे मैंने आपको अज्ञानता के कारण  क्या -क्या नहीं बोला। आज कुछ साधुसंत आ गए थे धन्ना उनकी सेवा टहल में लगे थे। भगवान् का खाना खेत पर लाने में आज देर हो गई थी । भगवान थककर लेट गए उनकी आँख लग गई थी। 

भगवान् बोले ये तुम्हारी चतुराई नहीं चलेगी अब हिस्सा देने का समय आ गया तो मुझे भगवान् -वगवान कहने का नाटक कर रहे हो। मेरा हिस्सा निकालो। 

धन्ना पैर छोड़ने को तैयार नहीं हुए -धन्ना ने जो बीज संतों के मुख में बोया था वह  पल्लवित होकर भगवान् रूप में धन्ना जी के खेत में आ गया था । 

कथा का सन्देश यहां पर यह है :संतों को कराया भोजन कभी व्यर्थ नहीं जाता। 

धन्ना का , बीज के हिस्से का गेहूं बाज़ार में बेच के दाल ,आटा आदि खरीद कर संतों को भोजन खुद पकाकर कराना फलीभूत हुआ था । 

कोई जब भूखे को भोजन कराता है- भगवान् तब सबसे ज्यादा प्रसन्न होते हैं। जो अपना पेट काटकर दूसरों को अपने हाथ से परोसकर भोजन कराता है भगवान् उसका भंडार भरते रहते हैं। दूसरों को भोजन कराने वाले अन्न क्षेत्र में कभी कमी नहीं पड़ती है। 

जो संतों के मुख में डालता है वह मुख में उग आता है। भगवान् भजन से दिखाई देते हैं भाव से दिखाई देते हैं। वो स्वामी जी आज धन्ना के गुरु हो गए क्योंकि धन्ना के कारण धन्ना जी के गुरु को दर्शन प्राप्त हुआ था भगवान का। 

ये संत (स्वामी जी )एक बार धन्ना के खेत पे पधारे थे धन्ना स्वामी जी से बोले- भगवान् की मैं भी पूजा अर्चना  करना चाहता हूँ। महात्मा इधर उधर घूमकर लौट आये धन्ना  को एक मामूली गोल  पत्थर दिया कहते हुए यह शालिग्राम है इसकी पूजा किया करो -धन्ना ऐसा पूरे भाव से नित्य करते हैं और एक दिन साक्षात भगवान ही चरवाहा बनके आ जाते हैं धन्ना जी की गाय चराने। काम मांगने के बहाने। 

अब आज की राम कथा के प्रसंग में प्रवेश करते हैं :

सुनैना माँ ने किशोरी जी (जानकी जी )से कहा बेटी आज तुम्हारा स्वयंवर है  इसलिए बाग़ में जाओ गौरी माँ का पूजन करने । भगवान् राम जी भी ठीक इसी समय बाग़ में प्रवेश करते हैं गुरु - पूजन के लिए।  

एहि   अवसर आईं सीता सर ,

गिरिजा पूजन जननी पधारी।  

संग सखी सब सुभग सयानी ,

गावत गीत मनोहर वाणी। 

गृहस्थ आश्रम के लिए यह प्रसंग बड़ा महत्वपूर्ण है श्री राम करके दिखा रहे हैं ,श्री जानकी माता भी  वह करके दिखा रहीं हैं जो एक गृहस्थ को करना चाहिए। 

चरित्र करके दिखाया जा रहा है। दोनों की किशोरावस्था है। इस अवस्था में बेटा और बेटी सध गए तो उन्हें कोई डिगा नहीं सकता और यदि गिर गए तो कोई उठा नहीं सकता , मनुष्य के जीवन में हर सातवें वर्ष शरीरिक और मानसिक परिवर्तन होता है। चार चक्र युवावस्था के होते हैं।(०-७ शिशु - काल ;७ -१४ बाल्य काल ;१४ -२१ किशोरावस्था ;२१- २८ युवास्था जो आगे चलती है प्रौढ़ावस्था से पहले पहले तक ऐसे कई चक्र और भी आते हैं सात साला । हरेक सात साल के बाद हमारी पूरी चमड़ी भी बदल जाती है सांप की केंचुल सी।  

वयकिशोर सब भाँती सुहाए -

इसी उम्र में गुरु की शरण में जाइये। 

गुरु कोई शरीर नहीं होता। गुरु परमात्मा की किरण हुआ  करता  है। गुरु  मायने ज्ञान ,गरिमा ,मर्यादा ,प्रकाश ,सदाचार ,समर्पण -ये सब  गुण  गुरु के प्रतीक हैं। 

गौरी माने -ज्ञान ,प्रतिभा ,सेवा ,करुणा ,शील ,प्रेम ,त्याग, लज्जा ,समर्पण , दैवीय ,देवी ,दिव्य, मर्यादित ,सौम्यता । 

आज भारत की आत्मा को  खरोंच लगती  है क्योंकि स्त्रियां इस देश की आत्मा की  प्रतीक हैं जिन्हें आज एक सांसारिक ग्लोबल षड्यंत्र के तहत गिराया जा रहा है उदण्ड बनाया जा रहा है वस्त्र कम हो रहा है उनके तन   से.

 न्यायालय भी इनका समर्थन कर रहा है अनजाने ही यह सब हो रहा है। आज बहुत सावधान रहने की आवश्यकता है। योरोप में स्त्री का आकर्षण समाप्त हो चुका है क्योंकि  वह लगभग नग्न हो चुकी है।आज लड़कियों को जाने अनजाने  इसी दिशा में बढ़ाया जा रहा है। ये भारत है इसे नग्न देश मत बनाइये। यहां महादेव का जन्म होता है , महावीर का जन्म होता है।

अश्लील दृश्य नहीं चाहिए घर में बहु- बेटी का। मर्यादित आचरण और वस्त्र चाहिए घर -बाहर दोनों जगह।  
    


(१ )Vijay Kaushal Ji Maharaj | Shree Ram Katha Ujjain Day 12 Part 1 2016



(२)Vijay Kaushal Ji Maharaj | Shree Ram Katha Ujjain Day 12 Part 2 2016

सोमवार, 20 नवंबर 2017

Vijay Kaushal Ji Maharaj | Shree Ram Katha Ujjain Day 11 Part 1

कल विश्वामित्र जी दशरथ जी के भवन में आये -मांग करते हैं :

अनुज समेत देओ रघुनाथा 

असुर समूह सतावहिं मोहिं ,

मैं आचन  आयहूँ   नृप तोहि 

अनुज समेत देओ रघुनाथा ,

निशिचर वध मैं होवहुँ सनाथा। 

और किसी भी राजा के लिए यह बहुत दयनीय अवस्था है सज्जन शक्ति को अपनी सुरक्षा की गुहार करने के लिए राजदरबार आकर रोना पड़े उस राजा को कहाँ जगह मिलेगी आप सोच सकते हैं।  प्रभु  इस दृश्य को देख रहें हैं बोले तो कुछ नहीं लेकिन मन ही मन में निश्चय कर लिया -एक नहीं कई निश्चय उन्होंने उस  समय कर लिए :

(१)एक पत्नीव्रत ,जबकि दशरथ जी को ३५० रानियां थीं 

(२)मैं भोग के लिए राजगद्दी स्वीकार नहीं करूंगा ,सेवा के लिए करूंगा ,और जब सेवा की आवश्यकता पड़ी एक जानकी जी का भी त्याग कर दिया। जगत कल्याण के लिए लोकरंजन लोक प्रसन्नता के लिए उनका भी त्याग कर दिया। 

दशरथ जी ने कभी राज्य का भ्रमण  किया ही नहीं उन्हें ये भी नहीं मालूम -मेरे राज्य में मेरे देश में सज्जन-शक्ति की साधु -संतों की ,सज्जन - पुरुषों की क्या स्थिति है वे यज्ञ आदि अनुष्ठान भी कर पाते हैं या नहीं ,पुत्रेष्ठि यज्ञ कर पाते हैं या नहीं क्योंकि संतान तो दशरथ को जब तक थी नहीं जब तक श्रृंगी ऋषि ने आकर यह यज्ञ संपन्न नहीं करवाया। 
जो कुछ भी समृद्धि राज्य की होती है वह धार्मिक अनुष्ठानों से होती है चाहे वर्षा हो चाहे फसल पके ,क्योंकि मनुष्य का जीवन देवताओं के आधीन है और हमारे मालिक सबके देवता हैं और उनकी तृप्ति  के लिए यज्ञादिक  अनुष्ठान होते नहीं थे।देवता प्रसन्न होते हैं यज्ञ अनुष्ठान से और राक्षस ऐसे अनुष्ठान होने नहीं देते थे ।  
ताड़कादिक और राक्षस  आकर मार देते थे  संतों को ताकि देवता उनके यज्ञादि करने से प्रसन्न होकर उन्हें आशीर्वाद न दे सकें। 
साधू संपत्ति मांगने नहीं सम्मति (संतति )मांगने आता है। सत्ता उस समय साधू की खुशामद करके उसे बुलाती थी आज स्थिति अलग है। नेता जी का फोटो मंदिर और संतों के घर में जगह पाता  है। ट्रांसफॉर्मर में जितना ज्यादा वोल्टेज होगा करेंट भी उसी के अनुरूप होगा। कुम्भ में आकर दोनों आवेश ग्रहण करते हैं व्यक्ति भी ट्रांसफॉर्मर भी ,जनसाधारण भी और संत भी। 

 किसी  विशिष्ठ साधु की वाणी में ही तेज़ होता है वशिष्ठ  जी विशिष्ठ ही थे। राजन को कहते हैं राजन आज यज्ञ संस्कृति पर संकट है ,दे दो क्योंकि तुमको ये चारों पुत्र यज्ञ के द्वारा ही मिले हैं और जब  यज्ञ  ही सुरक्षित नहीं रहेंगे तो भविष्य में कोई पुत्रेष्टि यज्ञ  भी नहीं कर पायेगा। 

दो पुत्र उसी संस्कृति के अनुरक्षण के लिए दो ,दो अपने पास रखो। 

साधू ने बोला और सत्ता झुक गई 

अब दशरथ जी बोले ले  जाइये !मुनिवर ले जाइये अब आप ही इनके माता पिता हैं ।राम लक्ष्मण गुरु विश्वामित्र को सौंप दिए कहते हुए : 

तुम मुनि मातु पिता अब -

"विश्वामित्र महाधन पाई "-विश्वामित्र लिफाफा लेने नहीं गए थे "परमधन" लेने गए थे। 

"हमारो धन राधा राधा राधा ,

जीवन धन राधा श्री राधा श्री राधा। "

साधु का परमधन होता है 'भजन', वह वहां परलोक में जमा होता है यहां इस लोक के बैंक में जमा नहीं होता। 

रघुवंश में स्त्रियों का वध नहीं होता ,निषेध है इसका लेकिन विश्वामित्र बोले -राम ये पाप का मूल है। राक्षत्व की जड़ है। 
ताड़का का वध किया रामजी ने -ताड़का स्त्री नहीं थी राक्षसों की जननी   थी ,आसुरी प्रवृत्तियों की पोषक थी । दुराशा थी ,और दुराशा आशा को खा जाती है।

आशा सिर्फ राम से करो और जगह करोगे तो उपेक्षा मिलेगी। 

आशा एक राम जी से दूजी आशा छोड़ दो।  
सुबाहु का वध क्यों किया इसके बाद राम ने ,सुबाहु तो होता  है अच्छी बाजू वाला। सुन्दर बाजू थीं सुबाहु की बलिष्ठ थी बड़ी थीं लेकिन ये विशाल हाथ धर्म को सताने के लिए नहीं चाहिए ,ये सुबाहु लम्बी भुजाओं से धर्म संस्कृति को ही नष्ट कर रहा था। इसलिए राम कहते हैं इसको मैं मिटाता हूँ। 

मारीच (स्वर्ण मृग )को राम ने मारा नहीं ,मार नहीं सकते थे राम भी इसीलिए उसे सौ योजन दूर फेंक दिया ,मारीच (स्वर्ण मृग )के पीछे मनोहर कल्पनाओं के पीछे तो रामजी को भी दौड़ना पड़ा ,मोह का रावण अनेक नाटक करके आता है धोखा देकर। लक्ष्मण जैसे जागृत को भी धोखा देकर रावण सीता का अपहरण करके ले गया था।राम अपनी इन्हीं मनोहर कल्पनाओं के पीछे सीते  -सीते कहते दौड़ते हैं। सीता तो भक्ति को कहते हैं। यही है सन्देश कथा का। 

कथा मन के मालिन्य को धोने का साधन भी है साबुन भी। 
मनोहर कल्पनाओं को थोड़ा दूर रखा जा सकता है। राघव ने आकर यज्ञ संस्कृति को पुनर्जीवित कर दिया।विश्वामित्र की ही रक्षा नहीं की उनके मार्फ़त एक पूरी यज्ञ संस्कृति को बचा लिया राक्षसों का वध करके। 

विश्वामित्र बोले अभी एक यज्ञ और पूरा होना है :धनुष यज्ञ 

यह इच्छा विश्वामित्र जी ने तब प्रकट की जब राघव और लक्ष्मण दोनों गुरु विश्वामित्र की चरण सेवा कर रहे थे -विश्वामित्र बोले बेटा एक यज्ञ तो तुमने पूरा कर दिया अभी एक यज्ञ और अधूरा पड़ा है राघव बोले वह कौन  सा यज्ञ है ? 

जैसे ही विश्वामित्र ने धनुष यज्ञ बोला जानकी जी उनके मानस में आ गईं ,भक्ति बनके। जानकी जी भक्ति की प्रतीक हैं।भगवान् को मानसिक रूप से सीता जी दिखाई देने लगीं।  

भक्ति से मिलने के लिए भगवान् राम लालायित हो जाते हैं। 

"मंगल मूल लगन  दिव आया ,

हिम ऋतु  अगहन मास सुहावा। "

जनकपुर की पावन यात्रा के लिए भगवान् अपना दायां श्री  चरण आगे बढ़ाते हैं :पावन कदम बढ़ाते हैं :

धनुष यज्ञ सुनी रघुकुल नाथा ,

हर्ष चले मुनिवर के साथा।

जनकपुर की यात्रा माने भक्ति की यात्रा।  जीवन में भजन प्राप्त करने की यात्रा। बिना गुरु के साधन के न भक्ति प्राप्त होती है न भजन। भक्ति फलित होती है गुरु की कृपा से। भजन सफल होता है  गुरु के आशीर्वाद से। शास्त्र पढ़ने से बुद्धि बढ़ सकती है तर्कणा शक्ति बढ़ सकती है.

 भजन फलित होता है गुरु के सानिद्य से। गुरु अपने शिष्य को ऐसे सेता है जैसे पक्षी अपने अण्डों को सेता है।जो गुरु की रेंज में रहेगा वह पकेगा उन अण्डों की तरह जो मुर्गी के , पंखों के नीचे होते हैं।गुरु के साथ ही नहीं रहना है गुरु के पास भी रहना है। साथ रहना बहुत ज़रूरी नहीं है।पास रहना आवश्यक है। जो अंडे पंखों से बाहर रहते हैं वह सड़  जाते हैं। 

पास होने का मतलब मानसिक रूप से पास होना है ,गुरु की इच्छा में जीना है गुरु के आदेश को मानना है ,गुरु के आचरण में जीना है वैसे जीना है जो गुरु को पसंद है वैसा आचरण व्यवहार करना है  जो गुरु को पसंद है , फिर चाहें गुरु से कोसों मील दूर हों आप। 

मूर्ख शिष्य और लोभी गुरु :गुरु के साथ रहने से कई बार ईर्ष्या  के अलावा और भी खतरे पैदा हो जाते हैं। कथा है एक लालची गुरु थे। उनके दो चेले थे। गुरु ने जो मांग जोड़ के संजोया था वह सब जो भी थोड़ा बहुत था  एक पोटली में बाँध के रखते थे। चाबी अपने पास रखते थे। 
गुरु के दो शिष्य थे। दोनों की नज़र गुरु की पोटली पे रहती थी। सेवा का नाटक करते थे पहले मैं करूंगा ,दूसरा कहता पहले मैं चरण सेवा करूंगा गुरु जी की। गुरु जी ने कहा लड़ते क्यों हो ,एक -एक पैर बाँट लो। एक तुम दबा दो दूसरा  तुम।

चेले ऐसा ही करने लगे। एक बार एक चेला आश्रम से बाहर चला गया। रात हुई दूसरा गुरु जी का अपने हिस्से वाला पैर दबाने लगा। थोड़ी देर बाद अचानक गुरूजी ने करवट ली तो गुरु जी का दूसरा पैर इसके पाँव पर आ गया। चेला आपे  से बाहर हो गया। 

तेरी ये हिम्मत मेरा पाँव दबाएगा। लाठी लाया और गुरु जी पे पिल पड़ा। दूसरा जब बाहर से आया तो पूछा गुरु जी ये हाल कैसे हो गया। बूढ़े गुरु ने सब बयान कर दिया। अब दूसरा शिष्य अंदर गया और जलती हुई लकड़ी लाकर गुरु जी को मारता रहा जब तक वो मर ही न गए कहते हुए तेरी ये हिम्मत मेरे पैर का ये हाल कर दिया। उसने दूसरा पैर भी तोड़ दिया। 

इसलिए गुरु के आदेश में रहना ,गुरु की साँसों में जीना ज़रूरी है गुरु अपनी साधना  संपत्ति शिष्य को ही देकर जाता है। गुरु की चेतना कभी समाप्त नहीं होती ,गुरु प्रकट होते हैं और अंतर्ध्यान हो जाते हैं गुरु शरीर नहीं हैं ,तत्व हैं। गुरु के संकेतों को समझना और उनके अनुसार जीना है । 

आपका एंटीना गुरु से जुड़ा होना ज़रूरी है।गुरु के साथ रहते हुए भी यदि उसके संकेतों को नहीं समझोगे तो  पत्थर ही रहोगे।  
अगला प्रसंग आगे शबरी का है :
शबरी नाम की लड़की को अठारह बरस की उम्र में मतंग ऋषि छोड़कर चले गए कहकर बेटी तेरे द्वार पर एक दिन राम आएंगे। पुरुष वेश में पहली बार जो तेरे द्वार पे आये समझ जाना राम आये हैं ,गुरु की वाणी सत्य होती है। 

(ज़ारी )  

सन्दर्भ -सामिग्री :

(१)https://www.youtube.com/watch?v=4PNoII8M9To

(२ )0

Vijay Kaushal Ji Maharaj | Shree Ram Katha Ujjain Day 11 Part 1

:55 / 1:00:15

Vijay Kaushal Ji Maharaj | Shree Ram Katha Ujjain Day 11 Part 2,and Part 3

सत्य का आचरण करते -करते जिसके जीवन में भक्ति की बिंदी आ गई वही संत हो जाया करता है। साधू झूठ नहीं बोलता। भरोसा कर लिया शबरी ने भगवान् आयेंगे ,जिस समय भगवान् इनके द्वार पर आये ये अस्सी बरस की हो गई थीं ,भजन गा रहीं थीं ,पूजा में थीं ,गुरुदेव की चेतना इनके अंदर से बोल पड़ी -ओ सबरी देख ?क्या देखूं ?द्वार पे कौन है ?भगवान्  खड़े थे: 

शबरी देखि  राम बिनि आये, 

मुनि के वचन समुझ जिये आये। 

साधु चरित शुभ चरित कपासू। 

साधु का कहा झूठ नहीं होता सत्य ही सिद्ध होता है। 

अरि शबरी देख !तेरे द्वार पे राम आये हैं  द्वार पर शबरी ने देखा दो राजकुमार आये हैं। गुरु की चेतना जीवित रहती है साथ जाती है इस लोक से उस लोक तक। गुरु शिष्य को नहीं छोड़ सकता ,उसकी मज़बूरी है।शरीर का धर्म होता है शरीर जाया होता है मरता है क्षय होता है शरीर का ,गुरु मरा नहीं करते अंतर्ध्यान हुआ करते हैं। 
स्वामी विवेकानंद के भाषण के शताब्दी समारोह वर्ष के बारे में एक फटॉग्रफर का संस्मरण  "पंजाब केसरी"अखबार  में छपा था जो उस समय फटॉग्रफी के क्षेत्र में एक बालक ही था ,वह भी उस अंतर् -राष्ट्रीय -धर्मसभा में था जिसमें स्वामीजी ने सम्भाषण किया था। इस बालक के पिता ने कहा तुम फोटो खींचो ,इस बालक ने सबके चित्र उतारे और चित्र तैयार करने के बाद होटल के जिन -जिन कमरों में सब धर्मगुरु रुके हुए थे वहां -वहां जाकर  सबके फोटो देकर आया। 
जब यह विवेकानंद जी के कमरे में पहुंचा तो इसने पूछा आपके पीछे एक साधु खड़े हुए थे वे कौन थे मैं उनके चरण छूना  चाहता था ,यदि आप मिला दें तो।  बोले विवेकानंद मुझे तो इस बात का इल्म ही नहीं है के कोई और भी मेरे पीछे खड़ा था। चित्र दिखाओ -देखा चित्र तो परमहंस रामकृष्ण थे उस चित्र में जो आठ वर्ष पहले ही शरीर छोड़ चुके थे जो इस चित्र में विवेकानंद जी के पीछे आभामंडल रूप में खड़े थे।  

सन्देश यही था -गुरु शरीर छोड़ता है उसकी चेतना शिष्य  के साथ -साथ रहती है ,गुरु नहीं मरता है कभी। इस जन्म से उस जन्म तक गुरु का आशीर्वाद साथ रहता है गुरु साथ नहीं छोड़ता। 
आज भगवान् गौतम ऋषि के आश्रम पहुँचते हैं गुरु विश्वामित्र के साथ ,आश्रम जो निर्जन पड़ा है ,यहां एक बड़ी शिला भी पड़ी हुई है। भगवान् पूछते हैं यह क्या  लीला है इतना बड़ा आश्रम और पशु -पक्षी ,जीव -जन्तु विहीन ,नीरव निर्जन प्रदेश -वत शून्य।  
'चरण कमल रज चाहती ' ये जो शिला तुम देखते हो यह गौतम ऋषि की पत्नी थी जिसने बरसों तुम्हारी प्रतीक्षा की ,इस का उद्धार करो।पति गौतम ऋषि के शाप  से यह शिला हो गई थी जिसने इसे त्याग दिया था। 

भारत का साधु भगवान् से भक्त के लिए प्रार्थना ही करता है और कुछ नहीं चाहता। साधू कभी अपना कल्याण नहीं चाहता ।वह समाज का कल्याण चाहता है। भक्ति कथा से आती है। अहिल्या जी का प्रसंग बहुत मार्मिक प्रसंग है जो हमारे अपने जीवन से जुड़ा है। जीवन की समस्याओं से जुड़ा है। अहिल्या जी बुद्धि का प्रतीक हैं  जिसे शतरूपा कहा गया है यह सौ रूप बदलती है। जब कुम्भ चलेगी  बुद्धि भक्तानि रहेगी ,कुम्भ पूर्ण हो जाने के बाद (कथा के बाद) ये मयखाने जायेगी ,धोखा देती है बुद्धि।इसकी बातों में मत आइये।  

गुण और अवगुण साधु और पापी दोनों में बराबर होते हैं सवाल यह है आप  जीवन का कौन सा कमरा खुला रखते हैं सद्गुणों का या दुर्गुणों का।बुद्धि भ्रमित कर देती है। जैसा भी मौसम होता है,वैसी ही हो जाती है । वह वनस्पति ,वह पौध आ जाती है जैसा भी मौसम होता है।  बीज गर्भ में पड़े रहते हैं मौसम के आते ही पौधा ज़मीन से निकलकर आता  है।
पीना छोड़ दिया लेकिन पीने के बीज अंदर पड़े थे ,अगर बीज है और उसका मौसम आया तो वह निकलेगा। अहिल्या का  इंद्र के प्रति शादी से पूर्व आकर्षण था। ब्रह्मा जी की बेटी थी अति सुन्दर भी इतनी के इंद्र  खुद  भी इन पर मोहित थे सम्मोहन का बीज इंद्र के अंदर भी पड़ा हुआ था। आकर्षण का बीज है तो वह ऊपर आएगा मौसम देखकर। 

बुद्धि की मत सुनिए आत्मा की सुनिए। अहिल्या ने अपराध ज़रूर किया लेकिन पति से छिपाया नहीं। पाप छुपाने से बढ़ता है और पुण्य गाने बताने से घटता है ,जिसे हम छुपा कर रखते हैं मरते समय वही हमारे  पास बचता है।

किये हुए कर्म भोगने पड़ते हैं। 

"अवश्यमेव भोक्तम  " 

जो भी भला बुरा है श्री राम जानते हैं ,हमारा जीपीएस हैं श्री राम। 

बन्दे के दिल में क्या है भगवान् जानते हैं। 

आता कहाँ है कोई ,जाता कहाँ है कोई ,

युग युग से इस गति को ,श्री राम जानते हैं। 

चरण कमल रज चाहती कृपा करो रघुवीर -विश्वामित्र भगवान् राम से कहते  हैं :

सन्देश यही है कथा का :पाप हुआ है तो ज़ाहिर कर दो छुपाओ मत। 

गुरु को बतला दो उसके चरणों में बैठकर ,किसी संसारी को नहीं -के मुझसे ये अपराध हो गया। संसारी को बतलाओगे तो वह ब्लेक मेल करेगा ,एक्सप्लॉइट करेगा ,परिवार को  और मित्रों को तो भूलकर भी मत बतलाइये। 

एक दिन गुरु ही पूजा   में बैठकर भगवान् से आपके लिए विनय करेगा -प्रभु कृपा करो इससे अपराध तो हुआ है लेकिन यह क्षमा माँगता है।  

अहिल्या चरण रज चाहती है।कृपा करो रघवीर चरण रज चाहती है यह नारी। 

भगवान् कहते हैं पाप करो - 

पाप तो होगा जैसे मछली बिना जल के नहीं रह सकती ,ऐसे ही मनुष्य बिना पाप के   रह नहीं सकता लेकिन जो कल हुआ वह आज कैसे हो रहा है ,नया नया करो रोज़ ,इसका अर्थ है जानबूझकर किया जा रहा है। पाप करना है तो बड़े से बड़ा करो नित्य नया करो -लेकिन जो जीवन में एक बार हो गया दोबारा नहीं चलता। 

फिर भी पाप हमारे जीवन में मौसम चक्र की तरह घूमता रहता है।चिता के साथ भी चिता  तक भी  नहीं छूटता ,चिता से आगे भी चला जाता है।  साबुन भी है धोने के लिए रोज़ गंदा  करो लेकिन रोज़ धोवो। महापुरुषों के जीवन में एक ही  बार घटना हुई है जानकी जी ने एक बार भूल की है शंकर जी एक बार स्खलित हुए हैं ,विश्वामित्र जी एक बार पतित हुए हैं नारद जी एक बार गिरें हैं दोबारा नहीं ,अहिल्या जी एक बार गिरीं हैं दोबारा नहीं।हम रोज़ -रोज़ गिरते हैं।  

कल  केवल मलमूल मलीना। पाप पयोनिधि जल बिन बिना मीना। 

अहिल्या जी का उद्धार हुआ। भगवान् ने कृपा कर दी भगवान् ने गौतम ऋषि  को बुला लिया गौतम जी  अहिल्या  जी को बुला लीजिये। अहिल्या जी से पवित्र दूसरी नारी नहीं है।

प्रभु आगे की यात्रा में   गंगा जी के किनारे आये हैं गंगाजी को देखकर भगवान् बैठ गए -पूछने लगे ये दिव्य नदी कौन है ?ऐसी नदी तो हमने स्वर्ग में भी नहीं देखी । गुरूजी कहते हैं गंगा को नहीं पहचानते आपके श्री कदमों से ही तो निकली है। भगवान् गंगा जी की कथा सुनना चाहते हैं।  

 भगवान् अब  गंगा की कथा सुनना चाहते हैं। 

जेहि प्रकार सुरसरि मुनि   आई ,

राम बिलोकहिं  गंग  तरंगा ,

 गंग  सकल मुद मंगल मूला। 

सब सुख करनी हरणी  सब शूला ....  

सब प्रकार के पाप का नाश करने वाली गंगा जी हैं। भक्ति कथा  के बिना नहीं आएगी। भगवान् सारे रास्ता कथा ही सुनते जा रहे हैं।अभी गौतम जी की स्त्री की कथा सुनी अब गंगा जी की कथा सुन रहे हैं। क्षिप्राजी गंगा जी की सगी बहन हैं क्षिप्रा जी भगवान् विष्णु के हृदय से निकलीं हैं और गंगा श्री चरणों से। प्रतिदिन गंगा में स्नान कीजिये। हरिद्वार उज्जैन को आप घर बुला सकते हो। वहां जाने की जरूरत नहीं है।कहीं भी नहाइये बस गंगा जी का आवाहन करिये हर- हर गंगे जैशिवशंकर। हर -हर गंगे जैशिवशंकर। अगर इतना बोलते हुए आपने स्नान किया तो आपको  लगेगा उज्जैनी ही नहाकर आये हैं हर की  पौड़ी ही  से नहाकर आये हैं।आखिर बाथ  रूम में आप मौज़ में होते हैं कुछ न कुछ हर व्यक्ति  गाता ही है। चुपचाप नहीं नहाता है मुक्त होता है  स्नानघर में आदमी।नित्य अपनी बाल्टी में बुलाओ गंगा जी को। 
कुछ न कुछ गंगा धाम पर जाकर दान करिये चाहे एक कप चाय ही पिला दो किसी साधू को। एक छोटी बुराई आप जो छोड़  सकते हैं ज़रूर छोड़िये।ये माँ है गंगा और क्षिप्रा इसकी सगी बहिन है और हर माँ यह चाहती है मेरा बेटा बाप की गोद  में जाए। कभी भी बाप गंदे बच्चे को गोद  में नहीं रखता मैले कुचैले बच्चे को नहीं उठाता, जगत का पिता भी :

मोहि कपट छल छिद्र न भावा ,
निर्मल मन जन सो मोहि पावा। 

माँ ही बच्चे को निर्मल करती है उसका मलमूत्र धौती  है ताकि बच्चा नहाकर बाप की गोद में जा सके ।

रास्ते में एक बहुत सुन्दर बागीचा पड़ता है राम लक्ष्मण जी के साथ विश्वामित्र वहीँ  ठहर जाते हैं। समाचार जनक जी को पता चलता है :

विश्वामित्र महामुनि आये ,

समाचार मिथिला पति पाये । 

जैसे ही जनक जी को पता चला सेवक सचिव अपने भाई को लेकर बागीचे में आये।   

संतों के दर्शन अगर आपके शहर में आये हैं उनके दर्शन ज़रूर करिये। क्योंकि संत भगवान् के पार्षद होते हैं।

जब संत मिलन हो जाये  , 

तेरी वाणी हरि गुण गाये ,

तब इतना समझ लेना ,

अब हरि से मिलन होगा।

बाग़ में दर्शन करने आये जनक जी बोले -गुरुवर मुझे तो स्मरण नहीं होता मैंने कभी कोई  पुण्य किया है ज़रूर मेरे पूर्वजों का पुण्य होगा जो आप मेरे नगर में आये।आपका मुझे दर्शन हो गया  राघव के रूप का जादू निर्गुण निराकार पर चल गया -जनक पूछने लगे ये दोनों बालक हैं या पालक हैं ?मुझे बताओ।
संत अगर आता है तो समझिये पीछे -पीछे राम जी भी आ रहें हैं। जनक के  हाथ जुड़ गए भगवान को देखकर। विश्वामित्र जी से बात करना भूल गए जनक जी। 



मुनि कुल तिलक के नृप कुल  पालक  

ब्रह्म जो कही नेति कही गावा   

इन्हहिं बिलोकत अति अनुरागा ,

बरबस ब्रह्म सुकहिं मन जागा। 

विदेह देह में डूब गये। 

जो वस्तु ,व्यक्ति और विषय से प्रसन्न या  अप्रसन्न होता है वह संसारी है ,जो असुरक्षा में जीता है वह संसारी है। 

जो निश्चिन्त रहता है हर हाल में मधुकरि या भिक्षा मिले या न मिले ,जिसकी प्रसन्नता या अप्रसन्नता किसी वस्तु विषय या व्यक्ति से नहीं जुडी है वह साधु है।जो परिश्थितियों की सवारी करता है ,जो आज के आनंद में है वह साधु है।
जो परिस्थितियों से विचलित होता है  वह संसारी है।

सीता राम ,सीता राम ,सीता राम कहिये ,

जाहि विधि राखै राम, ताहि विधि रहिये   . 

आ गए राज भवन में विश्वामित्र राम लक्ष्मण के साथ। जनक के आग्रह पर। 

'करो सुफल सबके नयन ,

बेटा सुंदर बदन दिखाओ' -ये निर्गुण के उपासकों का नगर है। ज़रा इन्हें  सगुण  के दर्शन कराओ। 

"जाहि देख आवहु  नगर ... सुखनिधान दोउ भाई ,

बेटा सुफल करो सबके नयन सुंदर बदन दिखाओ। " ये विदेह नगरी है इन्हें सगुण साकार का भी आस्वाद कराओ।विश्वामित्र ने दोनों को नगर देखने भेज दिया। 

समाचार पुर वासिन पाये  ,

देखन नगर आये दोउ भाई। -कौन हैं कहाँ से आये हैं ये राजकुमार इतने कोमल इतने सुन्दर, नगर वासियों की आखों में यही सवाल है ?

युवती भवन झरोखेहिं   लागीं  ..... 

वर सांवरो जानकी जोग ....  सखियाँ आपस में बतियाती हैं अरि ये सांवरो तो जानकी के योग्य है लेकिन ये तो बहुत कोमल है। धनुष कैसे उठाएगा ,दूसरी बोली इसका सौंदर्य देखके जनक अपनी प्रतिज्ञा बदल देंगे ,स्वयंवर में धनुष तोड़ने की शर्त ही समाप्त कर देंगें। एक  बूढ़ी नब्बे साला  बोली -अब इनका दर्शन तो बार -बार होगा ,जनक को जानकी बहुत प्यारी हैं जब ससुराल चली जाएंगी तो जनकजी , जल्दी -जल्दी बुलाया करेंगें ,ये दोनों विदा कराने आया करेंगे। हमें भी इन दोनों राजकुमारों का दर्शन हो जाया करेगा।सखियाँ अपनी सुध -बुध खोने लगतीं हैं एक भगवान से कहती है अब हमारा दिल तो हमारे पास रहा नहीं हम वगैर दिल के कैसे ज़िंदा रहेंगी ,आत्महत्या कर लेंगी। भगवान् बोले आत्महत्या की जरूरत नहीं है।  

भक्ति अगर घर में है तो -भगवान् को आना ही पड़ेगा।

द्वापर में आना सब ,सबको ले चलूँगा। इस बार तो मैं एक पत्नी का ही व्रत लेकर आया हूँ। 

सुन सखी प्रथम मिलन की बात -अब भगवान् और भक्ति सीता का जनक वाटिका में  मिलन होने वाला है।आगे का प्रसंग बड़ा सुन्दर है। ध्यान से सुनिए :

"लेंहिं  प्रसून चले दोउ भाई "-माली को चाचा जी कहके प्रणाम किया भगवान् ने । यही भगवद्ता है जो छोटे को बड़ा कर दे।माली कहने लगा भगवान् नहीं ऐसा मत करिये कहाँ आप और  मैं कहाँ  ?

 आज समाज में वह बड़ा माना जाता है जिसके सामने सब छोटे दिखाई दें। 

आ गया सम्पर्क में  जो ,धन्यता पा गया -

इधर श्री किशोरी जी का सखियों के साथ वाटिका में प्रवेश हो रहा है। उधर भगवान् ने वाटिका में प्रवेश लिया है। 

पूजन की करने तैयारी ,  सखिन  संग आई जनक लली.......

बीच, सिया -कुमारी सखिन  संग ,आईं जनक की  लली ...

निर्मल नीर नहाई  सरोवर ,

अरे शिवजी के मंदिर पधारीं  ,

सखिन  संग ,आईं जनक लली। 

अब शादी कल करेंगे ,आज की कथा को विराम देते हैं। 

जयश्री राम !

सन्दर्भ -सामिग्री :

(१ )

Vijay Kaushal Ji Maharaj | Shree Ram Katha Ujjain Day 11 Part 2


(२)https://www.youtube.com/watch?v=Z2ZvKCVsqJ4

(३)

Vijay Kaushal Ji Maharaj | Shree Ram Katha Ujjain Day 11 Part 3

रविवार, 19 नवंबर 2017

Vijay Kaushal Ji Maharaj | Shree Ram Katha Ujjain Day 10 Part 2,3

सत्संगति दुर्लभ संसारा ,

दुर्लभ सुलभ करा दे,ऐसा कोई संत मिले !

मेरा तार हरि संग जोड़े ,ऐसा कोई संत मिले। 

कल भगवान् का अंशों समेत अवतार हुआ था कथा में। 

घर -घर आनंद छायो  उज्जैनी नगरी में ,

राम जन्म सुनि , पुर नर -नारी ,

नाँचहिं गावहिं ,दे दे तारी ,उज्जैनी नगरी में। 

नेति नेति कहि  महिमा गावे 


वेदहु याको पार न पायो ,

वो बेटा  बन आयो ,उज्जैनी  नगरी में ,

उज्जैनी नगरी में। 

वेदहु बन के आयो ,उज्जैनी नगरी में। 

कौशल्या सुत जायो ,उज्जैनी नगरी में। 

अरे घर घर बजत  बढ़ायो ,उज्जैनी नगरी में। 

नाँचहिं गावहिं दे दे तारी ,उज्जैनी नगरी में। 
भगवान् राम का जन्म हो गया है अवध में जश्न का माहौल है :

जो  जैसे बैठहि उठी धावा -


जैसे ही राजमहल के  वाद्य यंत्र बजाये गये अटारियों से-जो जैसे भी स्थिति में था ,जहां भी बैठा था , जैसे भी था उठकर दौड़ा।

 भगवान् से मिलने के लिए किसी तैयारी  की आवश्यकता नहीं है। उपासना का सार तत्व है उल्लेखित चौपाई में।यही भगवान् से मिलने की आचार संहिता है। 

भगवान् से मिलने के लिए सिर्फ अपनी स्थिति बदलिए कुछ छोड़ने की जरूरत नहीं है बस अच्छे लोगों का संग साथ कीजिये बुरे आपको छोड़के स्वत : ही चले जाएंगे। 

संसार के काम में व्यवहार चाहिए भजन में स्वार्थ। भजन सबका अपना अपना जो कर ले सो तरे.भजन परमुखापेक्षी नहीं होता -तू करे तो मैं करूँ। 

भजन को सबसे पहले नज़र लगती है ,कोई देखता है तो हँसता है लो जी देखो स्वामी जी को। इसीलिए कहा गया है भोजन और भजन एकांत में। कोई देख न ले छिपा कर करें भजन इसके प्रदर्शन की भी जरूरत नहीं है।

भक्त को सूरदास की तरह होना चाहिए -विरह दग्ध -गोपियों की तरह विरह अग्नि में जलते सुलगते हुए होना चाहिए। आद्र और आर्त पुकार से मिलते हैं भगवान्। 

निसि दिन बरसत नैन हमारे ,
सदा रहत पावस ऋतु  हम पर ,
जप ते श्याम सिधारे। 
कहते हैं यमुना का पानी तो मीठा था ,कृष्ण द्वारका गए तो पूरे ब्रजमंडल का पानी खारा हो गया ब्रज वासियों के अश्रु -जल  से।

ब्रज के बिरही लोग बिचारे ,
बिन गोपाल ठगे से सारे। 

ऊपर से कृष्ण के सखा आ गए अपना ज्ञान बघारने। विरह अग्नि को उत्तप्त करने। नंदबाबा के घर का रास्ता पूछते हैं -गोपियाँ कहती हैं हम तभी समझ गए थे -ये कोई कृष्ण की उतरन पहनने वाला बहरूपिया है जिसे नंदबाबा का घर नहीं मालूम। 

बोली इस नाली  के संग -संग चला जा ,जहां जाकर ये खत्म हो वही नंद का घर है -वहीँ से निकलती है यह अश्रु -जल सिंचित धारा। 

आते ही तुमने हमारा जख्म कुरेद दिया। 

 (उद्धव कृष्ण के पुराने )वस्त्र ही पहनते थे इतना प्रेम था उनको कृष्ण  से।एक गोपी उन्हें दूर से देख बोली अपने कृष्ण आ रहे हैं दूसरी फ़ौरन उसकी बात काटते हुए बोली ,हमारे कृष्ण हमें देखवे के बाद रथ पे नहीं बैठे रहते रथ से उतर के दौड़े -दौड़े आते। ये कृष्ण नहीं हो सकते। कृष्ण लीलाएं गोपियाँ याद करती हैं :

अरे तेरो कुंवर कन्हैया मैया,

 छेड़े मोहि  डगरिया में ,

जल भरने यमुना तट जाऊँ ,

ये तो कंकर मारे गगरिया में। 

तमाम लीलाएं कृष्ण की गोपियों को सताने आने लगीं उद्धव जी को देख के। वैसा सा ही रूप बनाये थे।
उपासना के सूत्र का प्रसंग देखिये -

महाराज दशरथ राजमहल में आये भोजन करने -भोजन तैयार है पूछते हैं कौशल्या जी से ? 
हाँ  तैयार है : महाराज फिर बोले राघव कहाँ है ?

गली में खेल रहा है। 

सुमंत को भेजते हैं राघव को बुलाइये। दशरथ भगवान् को तो चाहते हैं आवाज़ नहीं लगाना चाहते। राया तो रथ पर जाते हैं ऐसे कैसे आवाज़ लगाते हुए भागें  बच्चों के पीछे। 

भोजन करति   बोले जब राजा ,
नहीं आवत तजि बाल समाजा। 
कौशल्या जब बोलन जाईं , ...... 

दशरथ जी धर्मात्मा राजा हैं। भोग को प्रसाद बनाइये -भक्त भोग नहीं प्रसाद पाता है।परमात्मा को भोग लगाने के बाद भोजन ही प्रसाद हो जाता है। 

 राम को गोद  में बिठाकर खाना तो खाना चाहते हैं दशरथ।लेकिन खुद गली में जाकर आवाज़ लगाने में उन्हें संकोच है।  आज गली में खेलते अपने बेटे राम को  बुलाने के लिए दशरथ नौकर सुमंत को भेजते हैं। 
"कल गुरु जी के सामने गिड़गिड़ाते थे जब मैं नहीं था।"- भगवान् नाराज़ हो गए।
"तुम राजा हो इसलिए तुम्हें नहीं  बुलाना चाहिए ? आवाज़ लगाने के लिए शर्म लग रही थी। "-अगर तुम्हें मेरा नाम लेने में शर्म लग रही है तो मैं आपका मुंह तक नहीं देखूंगा।यहां यही सन्देश देती है राम कथा। राम पुकारने से ही मिलते हैं।  
कौशल्या तो भगवान् के पीछे दौड़ती रहतीं हैं माँ हैं -भक्ति में पागल हैं भगवान् की। 

भगवान् कहते हैं आप जीतीं मैं हारा ,भगवान् रास्ते में ही रुक जाते हैं भागते -भागते । ये भक्ति मार्ग पागलों का पागलखाना ही है। 

लोग कहे मीरा भई बावली ...

मीरा जी ने किसी की नहीं सुनी लोगों ने उन्हें गाली दी मीरा ने उन्हें गीत दिया। जो जिसके पास होता है वह वही देता है। 
चरित्र करके दिखाया जाता है भगवान् राम यही करते हैं -माता ,पिता ,गुरु तीनों की चरण वंदना करते है प्रात : उठते ही। 

जिन मातु पिता की सेवा की ,

तिन तीरथ धाम कियो न कियो । 

जिनके हृदय श्री राम बसें ,

तिन और को नाम लियो न लियो।

सन्देश यहां पर यही है कथा का -हुड़किये मत माता पिता को ,जो इनका अपमान करता है भगवान् उस से पीठ मोड़ लेते हैं। 

बूढ़ी  माँ को बच्चों और अपनी पत्नी के सामने जो पुरुष फटकारता है ,उस माँ को प्रसव की पीड़ा याद आ जाती है। 

'भादों के बरसे बिन ,माँ के परसे बिन' -

पेट नहीं भरता है -धरती भी प्यासी रहती है। यशोदा को कृष्ण की तरह प्यार न कर पाओ कोई बात नहीं उसका अपमान तो मत करो। 

माँ भोजन नहीं करती है बालक के भूखे होने पर।

 संतान और माँ साथ -साथ पैदा होते हैं जब पहली संतान पैदा होती है माँ भी तो तभी माँ बनती है।

माँ को कमसे कम इतना तो सोचने का मौक़ा दो -मेरा बेटा मेरा है। कुछ और न सही घर आने पर माँ का हाल चाल ही पूछ लीजिये। 

राम बचपन से इसी मर्यादा का पालन करते हैं। 

अब विश्वामित्र  रिषी   का प्रवेश हो रहा है कथा में :

हरी बिन मरै नहीं निसिचर पाती  
मन का अपना स्वभाव है वह एक बार में एक ही काम कर सकता है -कथा सुन रहे हैं तो कथा ही सुनिए ,स्वेटर मत बनिये ,बीज मत छीलिए ,जबे मत तोड़िये।

 जो इन्द्रीय सक्रीय होती है मन उसी में जुड़ जाता है।

सुनो  तात  मन चित लाई  -कथा को ध्यान से सुनिए। कबीर कहते हैं :

तेरी सुनत सुनत बन जाई ,
हरि कथा सुनाकर भाई।
रंका तारा ,बंका तारा ,
तारा सगल कसाई ,
सुआ पढ़ावत गणिका तारी ,

तारी मीराबाईं  ,
हरिकथा सुनाकर भाई। 
गज को तारा गीध को तारा ,

तारा सेज सकाई ,
नरसी धन्ना सारे तारे ,
तारी करमाबाई । 
जो कुछ हम कानों से सुनते हैं वही हमारे मन में बस जाता है। हनुमान चालीसा में इसका प्रमाण है

प्रभु चरित्र  सुनबै के रसिया  
राम लखन  सीता मनबसिया .....
भोग बसें  हैं मन में ,तो भोग को ही खोजोगे ,भगवान बसे  हैं तो भगवान् को खोजोगे ,भगवान् की खोज संतों के मिलन से पूरी होती है। 

बिनु हरिकृपा मिलहिं  नहीं संता ,

सतसंग भी कुसंग की तरह संक्रामक होता है।इसकी virility का अंदाज़ा नहीं लगा सकते आप।  

जब संत मिलन हो जाये  ,तेरी वाणी हरिगुण गाये, 

तब इतना समझ लेना, अब हरी से मिलन होगा।

जब संत मिलन हो जाये ,तेरी वाणी हरिगुण गाये ,

आँखों से आंसू आये ,
तेरा मन गदगद  हो जाये ,
दर्शन को मन ललचाये ,
कोई  और न मन को भाये ,
तब इतना समझ लेना ,
अब हरी से मिलन होगा। 
कथा सुन ने की लालसा है तो कोई न कोई संत भी मिल ही जाएगा। चाय पीने की लालसा है तो कोई खोखा भी चाय का मिल ही जाएगा। 
विश्वामित्र -राम के भक्त बड़े पुरुषार्थी तपस्वी महात्मा हैं। लेकिन निशाचरों से मुक्त न हो पाए।इन्होनें त्रिशंकु नाम के राजा को सशरीर स्वर्ग में भेज दिया नियम विरुद्ध जब देवताओं ने विरोध किया तो  एक नए स्वर्ग की ही रचना कर दी लेकिन निशाचरों से मुक्त नहीं हो पाए। हथियार डाल दिए ,यज्ञादिक अनुष्ठान छोड़ दिए। 

निशाचर कोई व्यक्ति नहीं है वृत्ति है।आदतों को प्रवृत्ति को नहीं कहते निशाचर । वह नहीं हैं ये जिन्हें हम राक्षस समझते हैं। 
निसाचर योनि नहीं है ,जो आदतें आपको निशि में विचरण कराती हैं  निशाचरण कराती हैं।वे आदतें जो हम को  उजाले से अँधेरे में ले जाती हैं ये आदतें संतों को भी सतातीं हैं। बीमारी सताती नहीं हैं दुष्प्रवृत्तियाँ सताती हैं -

सताती मतलब -सतत ,एक पल भी नहीं छोड़तीं दुष्प्रवृत्तियाँ। 
बुराई को भगवान  ही दूर कर सकते हैं। अच्छों के पास बैठो।बुराई से कोई अनुष्ठान ,पूजा पाठ नहीं बचाता है ,रोग तो औषधि से दूर होगा ,जब मनुष्य का सिर खाली रहेगा उसे बुराई से कोई बचा नहीं सकता। 
माता पिता को सर पे रखिये ,गृहस्थी होने पर अपने छोटे बच्चों को अपने सर पे बिठाइये -वे मेरे इस आचरण के बारे में क्या सोचेंगे जो मैं करने जा रहा हूँ । करने से पहले सोच लें।     

हरिबिनु मरै न निसचर पापी (पाती )

केहि कारण आगमन तुम्हारा ,
कहउँ सो करदन बाहउ  वारा ?

दशरथ जी ने जब पूछा विश्वामित्र से- 

बोले विश्वामित्र रोते हुए मैं तुमसे भीख मांगने आया हूँ -
असुर समूह सतावन ...

मैं याचन आयो नृपत 

भगवान् राम खड़े थे उन्होंने तभी निर्णय ले लिया मेरे पिता के राज्य में ऋषि रो रहें हैं। भगवान् ने तभी प्रतिज्ञा कर ली ,मेरे राज्य में कोई दुखी नहीं रहेगा ,किसी ऋषि तपस्वी को रोना नहीं पड़ेगा ।

साधू !जवानी में अनुष्ठान करते हैं बुढ़ापे में सुख पाते हैं इस धर्मचर्चा का। "मैं सनाथ होना चाहता हूँ राजन ,अभी तक मैं अनाथ हूँ ,भगवान् से दूर हूँ ,आप  राक्षसों को तो मार देंगें मैं तो अनाथ ही रहूँगा ,मुझे राम -लक्ष्मण की जोड़ी चाहिए। "-सविनय बोले थे विश्वामित्र दशरथ जी को। 
विश्वामित्र जी रामलखन को ले जाते हैं इसके आगे की चर्चा अगले अंक में। 
जयश्रीराम !जयसियाराम !जैसीताराम !

 सन्दर्भ -सामिग्री :

(१ )

Vijay Kaushal Ji Maharaj | Shree Ram Katha Ujjain Day 10 Part 2


(२ )https://www.youtube.com/watch?v=3qAK69WGJTc

(3 )

Vijay Kaushal Ji Maharaj | Shree Ram Katha Ujjain Day 10 Part 3

शनिवार, 18 नवंबर 2017

What is Gout , Treatments and drugs (Hindi l, ll) ?

गाउट ,संघिवात या गठिया में इलाज़ और दवा- दारु का दिया जाना रोग की मौजूदा स्थिति से शुरू होता है इलाज़ तो हर हाल चाहिए ही आपकी मर्ज़ी भी पूछी जाती है उपलब्ध  विकल्पों के बारे में।

रोग के  तेज़ और उग्र लक्षणों के शमन के  लिए भी इलाज़ है भविष्य में ऐसे हमलों से बचाव भी होता है इलाज़ से और रोग का पेचीला पन भी कारगर और आपको माफिक आये इलाज़ से टलता ही है।यह पेचीला पन जोड़ में मोनो -सोडियम यूरेट क्रिस्टलों  के जमा होते रहने  से पैदा होता है।इस स्थिति को टोफ़स (Tophus )कहते हैं। गाउटी -टॉफ़ी (Gouty Tophi)भी। उल्लेखित लिंक देखें अंग्रेजी का। 

अक्सर उल्लेखित दवाओं का इस्तेमाल उग्र लक्षणों की तीव्रता कम करने आइंदा होने वाले रोग के उग्र रूप को मुल्तवी करना रहता है। 

(१)सूजन ,प्रज्वलन ,संक्रमण को रोकने का काम करने के लिए ऐसी दवाएं जिनमें स्टीरॉइड्स शामिल नहीं रहते हैं दी जाती हैं इन्हें ही 'नान  -स्टीरॉइडल एंटी -इंफ्लेमेटरी  ड्रग्स' कहा  जाता है।अंग्रेजी में (NSAIDs).

इनमें बिना डाक्टरी पर्ची के मिलने वाली सहज  उपलब्ध ओवर दी काउंटर ड्रग्स शामिल हैं यथा -आइबूप्रोफेन (Advil ,Motrin IB,others );नेप्रोक्सेन सोडीयम (Aleve,others ).

अलावा इसके तेज तर्रार ज्यादा पोटेंट दवाएं भी हैं जिनके लिए प्रिस्क्रिप्शन स्लिप चाहिए ,डाक्टरी नुस्खा उसके हाथ का लिखा चाहिए -इंडोमेथासिन (इंडोचीन या इंडोसन ),या केलकॉक्सिब (Celebrex,Celecoxib)इसी वर्ग में आतीं हैं। 


Do You Have Gouty Tophi?

You’ll know you have gouty tophi if you have “knobs” just under the skin that feel like buried marbles. And they don’t hurt, but they sure are hard. Do they look like this gout picture? Or are they not that bad yet? Gouty Tophi is NOTHING to mess around with. As painful and inconvenient as these knobs are….you must realize that they are also forming inside your organs. This is very serious, and yes it can even kill you.

gouty tophus

Gouty Tophus

JUNE 4, 2011Gouty Tophus is Your Last Warning Sign, because Gouty Tophus in your internal organs means….you die. No joke. You see all those gouty tophus lumps in these gout pictures?  Now visualize these same lumps inside your kidneys and liver.  Yep . . . you’re toast. Gouty tophus appears in the FINAL STAGES of gout…when your […]

(२ )कोल्चिकिने (Colchicine):

यह एक तरह की दर्दनाशी ,दर्द-हारी दवा ही है जिसे एनलजेसिक कहते हैं गठिया के दर्द को कम करने में ये एकदम से असरकारी रहती है। इसे ही Colcrys,Mitigare)कह दिया जाता है जो इसका व्यावसायिक नाम भी होता है। अलबत्ता इसके अवांछित पार्श्व प्रभाव (side effects )इससे मिलने वाले लाभ को बराबर कर देते हैं जिनमें शामिल हैं मतली (जी मिचलाना ,उबकाई आना ,वमन का हो जाना ,और अतिसार यानी उलटी दस्त साथ -साथ होना  -diarrhea). 

अलबत्ता रोग का उग्रतर रूप हल्का पड़ने ,शांत हो  जाने पर आइंदा होने वाले ऐसे ही हमलों से बचाव के लिए इसी दवा की छोटी खुराकें दी जा सकतीं हैं। 

(३ )कॉर्टिकॉस्टेरॉइड्स (Corticosteroids): 

ये दवाएं खाने वाली गोलियों के रूप में भी और सुईं (इंजेक्शन )के ज़रिये भी सीधे जोड़ में पहुंचाई जातीं हैं। प्रेड्निसोने इसी वर्ग की दवा है।अलबत्ता ये दवाएं उन मरीज़ों को ही दी जातीं हैं जिन्हें ऊपरलिखित दोनों वर्गों की दवाएं माफिक नहीं आती हैं या किसी और वजह से भी नहीं दी जा सकतीं हैं NASIDs और कोल्चिकिने। 

कॉर्टिकॉस्टेरॉइड्स के  पार्श्व  प्रभावों में आपके मिज़ाज़ में यकायक बदलाव का आना mood बदलना ,खून में तैरती शक्कर के स्तर का बढ़ना और ब्लड प्रेशर का स्तर बढ़ना आदि शामिल रहते हैं या रह सकते हैं। 

अलबत्ता ये गाउट से पैदा पीड़ा ,जोड़ की ज्वलनशीलता ,सूजन आदि  को कम करतीं हैं।  

अलावा इसके गाउट का पेचीला- पन से बचाव की दवाएं भी हैं :

उन मामलों में जिन में साल में कई हमले रोग के हो जाते हैं और ऐसा हर साल होता है या फिर हमले तो उतने नहीं होते लेकिन जो भी होते हैं उनमें पीड़ा असहनीय हो जाती है -पेचीलापन मुल्तवी रखने वाली दवाएं दी जा सकती हैं। 

अलावा इसके गाउट का पेचीला- पन से बचाव की दवाएं भी हैं :

उन मामलों में जिन में साल में कई हमले रोग के हो जाते हैं और ऐसा हर साल होता है या फिर हमले तो उतने नहीं होते लेकिन जो भी होते हैं उनमें पीड़ा असहनीय हो जाती है -पेचीलापन मुल्तवी रखने वाली दवाएं दी जा सकती हैं। 



Treatment for gout usually involves medications. What medications you and your doctor choose will be based on your current health and your own preferences.
Gout medications can be used to treat acute attacks and prevent future attacks as well as reduce your risk of complications from gout, such as the development of tophi from urate crystal deposits.

Medications to treat gout attacks


Drugs used to treat acute attacks and prevent future attacks include:
  • Nonsteroidal anti-inflammatory drugs (NSAIDs). NSAIDs include over-the-counter options such as ibuprofen (Advil, Motrin IB, others) and naproxen sodium (Aleve, others), as well as more-powerful prescription NSAIDs such as indomethacin (Indocin) or celecoxib (Celebrex).
    Your doctor may prescribe a higher dose to stop an acute attack, followed by a lower daily dose to prevent future attacks.
    NSAIDs carry risks of stomach pain, bleeding and ulcers.
  • Colchicine. Your doctor may recommend colchicine (Colcrys, Mitigare), a type of pain reliever that effectively reduces gout pain. The drug's effectiveness is offset in most cases, however, by intolerable side effects, such as nausea, vomiting and diarrhea.
    After an acute gout attack resolves, your doctor may prescribe a low daily dose of colchicine to prevent future attacks.
  • Corticosteroids. Corticosteroid medications, such as the drug prednisone, may control gout inflammation and pain. Corticosteroids may be administered in pill form, or they can be injected into your joint.
    • Corticosteroids are generally reserved for people who can't take either NSAIDs or colchicine. Side effects of corticosteroids may include mood changes, increased blood sugar levels and elevated blood pressure.

    Medications to prevent gout complications

    If you experience several gout attacks each year or if your gout attacks are less frequent but particularly painful, your doctor may recommend medication to reduce your risk of gout-related complications.
    Options include:


Medications that block uric acid production. Drugs called xanthine oxidase inhibitors, including allopurinol (Aloprim, Lopurin, Zyloprim) and febuxostat (Uloric), limit the amount of uric acid your body makes. This may lower your blood's uric acid level and reduce your risk of gout.




  • Side effects of allopurinol include a rash and low blood counts. Febuxostat side effects include rash, nausea and reduced liver function.
  • Medication that improves uric acid removal. Probenecid (Probalan) improves your kidneys' ability to remove uric acid from your body. This may lower your uric acid levels and reduce your risk of gout, but the level of uric acid in your urine is increased. Side effects include a rash, stomach pain and kidney stones.


  • Lifestyle and home remedies

    By Mayo Clinic Staff
    Medications are the most proven, effective way to treat gout symptoms. However, making certain lifestyle changes also may help, such as:

    • Limiting alcoholic beverages and drinks sweetened with fruit sugar (fructose). Instead, drink plenty of nonalcoholic beverages, especially water.
    • Limit intake of foods high in purines, such as red meat, organ meats and seafood.
    • Exercising regularly and losing weight. Keeping your body at a healthy weight reduces your risk of gout.








  • Alternative medicine

    By Mayo Clinic Staff
    If gout treatments aren't working as well as you'd hoped, you may be interested in trying an alternative approach. Before trying such a treatment on your own, talk with your doctor — to weigh the benefits and risks and learn whether the treatment might interfere with your gout medication. Because there isn't a lot of research on alternative therapies for gout, in some cases the risks aren't known.
    Certain foods have been studied for their potential to lower uric acid levels, including:

    • Coffee. Studies have found an association between coffee drinking — both regular and decaffeinated coffee — and lower uric acid levels, though no study has demonstrated how or why coffee may have such an effect.
      The available evidence isn't enough to encourage noncoffee drinkers to start, but it may give researchers clues to new ways of treating gout in the future.
    • Vitamin C. Supplements containing vitamin C may reduce the levels of uric acid in your blood. However, no studies have demonstrated that vitamin C affects the frequency or severity of gout attacks.








  • Talk to your doctor about what a reasonable dose of vitamin C may be. And don't forget that you can increase your vitamin C intake by eating more vegetables and fruits, especially oranges.
  • Cherries. Cherries have been associated with lower levels of uric acid in studies, as well as a reduced number of gout attacks. Eating more cherries and drinking cherry extract may be a safe way to supplement your gout treatment, but discuss it with your doctor first.

  • Other complementary and alternative medicine treatments may help you cope until your gout pain subsides or your medications take effect. For instance, relaxation techniques, such as deep-breathing exercises and meditation, may help take your mind off your pain.

    सन्दर्भ -सामिग्री :

    (१ )

    Treatments and drugs

    By Mayo Clinic Staff

    Gout

    (३ )https://www.mayoclinic.org/diseases-conditions/gout/basics/treatment/con-20019400

    (४ )https://www.mayoclinic.org/diseases-conditions/gout/basics/alternative-medicine/con-20019400

    (५ )

    Alternative medicine

    By Mayo Clinic Staff

    (६ )https://www.mayoclinic.org/diseases-conditions/gout/basics/lifestyle-home-remedies/con-20019400

    Lifestyle and home remedies

    By Mayo Clinic Staff

    (६)
    You’ll know you have gouty tophi if you have “knobs” just under the skin that feel like buried marbles. And they don’t hurt, but they sure are hard. Do they look like this gout picture? Or are they not that bad yet? Gouty Tophi is NOTHING to mess around with. As painful and inconvenient as these knobs are….you must realize that they are also forming inside your organs. This is very serious, and yes it can even kill you.