मंगलवार, 9 अगस्त 2016

जो दीसै सो चालणहारु ,लपटि रहिओ तह अंध अंधारु

अनिक भाति माइआ के हेत ,सरपर होवत जानु अनेत।

बिरख का छाइआ सिउ रंग लावै ,ओह बिनसै उहु मनि पछुतावै।

जो दीसै सो चालणहारु ,लपटि रहिओ तह अंध अंधारु।

बटाऊ सिउ जो लावै नेह ,ता कउ  हाथि न आवै केह।

मन हरि के नाम की प्रीति सुखदाई ,

करि किरपा नानक आपि लए लाई।  

भावार्थ : माया के प्रेम (आकर्षण )अनेक किस्मों (प्रकार ,तरहों )के हैं ,(लेकिन यह सारे )अंत में नष्ट हो जाने वाले समझो।
(यदि कोई मनुष्य )वृक्ष की छाया के साथ प्रेम करे ,(परिणाम यह होगा कि )की वह छाया नष्ट हो जाती है ,और वह मनुष्य

मन में पश्चाताप  करता है। गोचर जगत नश्वर है ,चलायमान है ,अभी है, अभी नहीं है ,निरन्तर बदलाव से गुजर रहा है।

यही तो माया है।

अभी सुख है अभी दुःख है , अभी क्या था ,अभी क्या है ,

जहां दुनिया बदलती है उसी का नाम दुनिया (माया )है।

This life is a tenure ,we are endowed with a definite number of breaths .

ई दम दा मैं नु कि वे भरोसा ,आया ,आया न आया न आया। 


इस (जगत )से यह अँधा मनुष्य अपनत्व बनाये बैठा है ,नेहा लगाए बैठा है। जो( भी) मनुष्य( किसी) यात्री से सम्बन्ध

जोड़ लेता है ,अंत में उसके साथ (हाथ )कुछ नहीं लगता -रहता है।

हे मन ! प्रभु के नाम का प्रेम ( ही ) सुख देने वाला है ;(पर )हे नानक !(यह प्रेम उस मनुष्य को प्राप्त होता है ,जिसे प्रभु

कृपा करके (अपनी ओर )लगाता है।

https://www.youtube.com/watch?v=hfiUbrvTuK4

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